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सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग ने केंद्रीय पूर्वोत्तर क्षेत्र शिक्षा और विकास राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार से आधिकारिक आवास मिंटोकगांग में मुलाकात की उनसे कई विषयों पर बातचीत की। CM तामंग ने कहा कि मैंने उनके आधिकारिक कार्यक्रमों और राज्य की यात्रा के लिए अपनी शुभकामनाएं दीं और उनके उपयोगी और सफल प्रवास की कामना की। उन्होंने आगे कहा कि मैं पूर्वोत्तर की प्रगति और विकास के लिए निरंतर सहयोग और सार्थक जुड़ाव की आशा करता हूं।

21 hours ago | [YT] | 41

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सेवा सेतु अभियान के तहत बीते दिन सांसद राजू बिष्ट महान गोरखा व्यक्तित्व स्वर्गीय डम्बर सिंह गुरुंग के परिजनों से मिले। डंबर सिंह गुरुंग ने संविधान सभा में गोरखाओं का प्रतिनिधित्व किया था । वह एक प्रतिष्ठित वकील और अखिल भारतीय गोरखा लीग (एबीजीएल) के संस्थापक में से एक थे। सांसद बिष्ट ने परिवार को आश्वासन दिया कि हम कलिम्पोंग में उनके सम्मान में डंबर चौक को अपग्रेड और सुंदर बनाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएंगे।

1 day ago | [YT] | 58

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राम बहादुर 'थापा' छेत्री : देहरादून से जकार्ता तक, भारतीय फुटबॉल के स्वर्णिम मिडफील्डर

दीपक राई, वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क
भारतीय फुटबॉल के इतिहास में 1962 का जकार्ता एशियन गेम्स हमेशा स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा, और उस टीम के केंद्र में थे देहरादून में जन्मे मिडफील्डर राम बहादुर छेत्री। राम बहादुर छेत्री का जन्म 15 फरवरी 1937 को देहरादून, तत्कालीन ब्रिटिश इंडिया में हुआ था। फुटबॉल की शुरुआत उन्होंने 1954 में स्थानीय अमर ज्योति क्लब से की, और बाद में उत्तर प्रदेश व बंगाल की टीमों का प्रतिनिधित्व भी किया। 1956 के DCM ट्रॉफी के बाद ईस्ट बंगाल के स्काउट्स की नजर उन पर पड़ी। तुलसीदास बलराम के साथ उन्हें क्लब में भर्ती किया गया, और 1957 से 1967 तक उन्होंने एक दशक तक ईस्ट बंगाल के लिए खेला। 1960-61 में उन्होंने टीम की कप्तानी भी की।

{ राष्ट्रीय टीम का सफर }

1959 में राम बहादुर को 1960 एशियन कप क्वालिफायर्स के लिए भारतीय राष्ट्रीय टीम में चुना गया। अगले ही साल उन्होंने रोम में 1960 ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनका सबसे बड़ा क्षण आया 1962 में। सैयद अब्दुल रहीम के कोचिंग में भारतीय टीम जकार्ता एशियन गेम्स में उतरी। राम बहादुर, फॉर्च्यूनेटो फ्रैंको, प्रशांत सिन्हा और यूसुफ खान के साथ मिलकर उस समय की भारतीय टीम की सबसे मजबूत मिडफील्ड मानी जाती थी। फाइनल में भारत ने दक्षिण कोरिया को 2-1 से हराकर गोल्ड मेडल जीता। इस विजेता टीम में राम बहादुर छेत्री का नाम डी.एम.के. अफजल, तुलसीदास बलराम, प्रदीप कुमार बनर्जी, चुन्नी गोस्वामी, जरनैल सिंह जैसे दिग्गजों के साथ दर्ज है। दो साल बाद 1964 में उन्होंने AFC एशियन कप में भारत को उपविजेता बनाने में भी योगदान दिया। खेल के बाद उन्होंने ONGC में बतौर अधिकारी नौकरी की।

{ सम्मान और विरासत }

एशियन गेम्स गोल्ड मेडल - 1962 जकार्ता
AFC एशियन कप उपविजेता - 1964 इजरायल
IFA शील्ड -1958 (ईस्ट बंगाल के साथ)
संतोष ट्रॉफी - 1959-60 (बंगाल के साथ)

ईस्ट बंगाल बेस्ट मिडफील्डर ऑफ द मिलेनियम का खिताब

4 दिसंबर 2000 को 63 वर्ष की आयु में गुजरात के शहर वडोदरा में उनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया, हालांकि आज तक इंटरनेट में उनका निधन देहरादून में ही बताया गया है जो गलत है। साल 2015 में उत्तराखंड खेल मंत्रालय ने मरणोपरांत उन्हें खेल रत्न के लिए अनुमोदित किया, जो राज्य के खिलाड़ियों के लिए गर्व का क्षण था।

फिल्म 'मैदान' में सैयद अब्दुल रहीम के युग को दिखाया गया, जिसमें राम बहादुर छेत्री का किरदार भी शामिल था, जो नई पीढ़ी को उस दौर से जोड़ता है। देहरादून का यह बेटा आज भी उत्तराखंड के युवाओं के लिए प्रेरणा है कि छोटे शहर से निकलकर भी एशिया का चैंपियन बना जा सकता है।

1 day ago (edited) | [YT] | 140

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हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ

देहरादून निवासी सुबेदार ईश्वर धन राई, 3/11 गोरखा राइफल्स और श्रीमती विमला राई की सुपुत्री चर्ब राई ने NEET परीक्षा उत्तीर्ण कर अपने माता-पिता, परिवार, राज्य एवं पूरे गोरखा समाज का नाम गौरवान्वित किया है। इस शानदार सफलता के लिए उन्हें एवं उनके माता-पिता को हार्दिक बधाई एवं मंगलमयी शुभकामनाएँ। ईश्वर से प्रार्थना है कि बेटी इसी प्रकार निरंतर सफलता प्राप्त करती रहे और भविष्य में एक सफल एवं प्रतिष्ठित डॉक्टर बनकर समाज और देश की सेवा करे।

बहुत-बहुत बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य की हार्दिक शुभकामनाएँ।

जय हिंद ! जय गोरखा !

1 day ago (edited) | [YT] | 450

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1 अक्टूबर 1967 में चीन को हराने वाली भारतीय सेना की 7/11 गोरखा राइफल्स के सिक्किम निवासी वीर चक्र विजेता हवलदार (बाद में ऑनरी कैप्टन) टिनजोंग लामा की यह तब की और अब की फोटो।

2 days ago | [YT] | 316

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ओडिशा पुलिस में अपने गौरवमय सेवा के बाद 'गोरखा गौरव' SAG कमांडेंट प्रसाद तामंग हुए सेवानिवृत्त

झारसुगुड़ा : ओडिशा आर्म्ड पुलिस के गोरखा बटालियन के कमांडेंट और SAG कमांडेंट प्रसाद तमांग बीते दिन पुलिस की अपनी गौरवशाली सेवा के बाद सेवानिवृत्त हो गए है। उनकी सेवानिवृत्ति के अवसर पर उनके सहयोगियों एवं अधीनस्थ पुलिसकर्मियों ने उनको बधाई देते हुए और आगे के सुखी जीवन के लिए शुभकामनाएं दी। श्री तामंग की सेवा के दौरान बेहतर पुलिसिंग में उनका योगदान, समर्पण और उनका योग्य नेतृत्व को हमेशा याद किया जाएगा। वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क आपका सेवानिवृत्त जीवन हमेशा सुख, शांति, समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य से भरा रहे, इसके लिए हृदय से प्रार्थना करता है।

2 days ago | [YT] | 182

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1 अक्टूबर 1967 : वीर चक्र विजेता हवलदार टिनजोंग लामा, चीन के खिलाफ चो ला का वह योद्धा जिसने RCL से पलट दी बाज़ी

दीपक राई
वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क
हवलदार टिनजोंग लामा भारतीय सेना की 7/11 गोरखा राइफल्स के जांबाज सैनिक थे। 1967 में वह चो ला सेक्टर में तैनात थे। वह हाल ही में महू स्थित इन्फैंट्री स्कूल से 57mm रिकॉयललेस गन (RCL) का कोर्स करके लौटे थे। यही प्रशिक्षण 1 अक्टूबर 1967 को इतिहास बनाने वाला था।

{ नाथू ला के बाद चो ला }

सितंबर 1967 में नाथू ला में भारत ने चीन को करारा जवाब दिया था। चीन बौखलाया हुआ था। चो ला, नाथू ला से 8 किमी उत्तर में 15,000 फीट से ऊंचा एक संकरा दर्रा था। यहां भारत की 10 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स और 7/11 गोरखा राइफल्स तैनात थीं। 1 अक्टूबर 1967 को एक सीमा पत्थर को लेकर विवाद हुआ। नायब सूबेदार ज्ञान बहादुर लिम्बू पर चीनी सैनिक ने बैनेट से हमला कर दिया। जवाब में गोरखा जवानों ने खुकरी निकाल लीं।

देखते ही देखते चीनी सेना ने लाइट मशीन गन, मोर्टार और हेवी मशीन गन से फायर खोल दिया। इस हमले में राइफलमैन देबी प्रसाद लिम्बू खुकरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, लांस नायक कृष्ण बहादुर शहीद हुए, और पॉइंट 15450 पर चीनियों ने कब्जा कर लिया।

{ वह निर्णायक क्षण }

पॉइंट 15450 से एक चीनी HMG (हेवी मशीन गन) लगातार आग उगल रही थी। राय गैप और चो ला पोस्ट पर भारतीय जवान भारी casualties झेल रहे थे। भारतीय मोर्चा टूटने की कगार पर था। चो ला पोस्ट पर 10 JAK राइफल्स की एक 57mm RCL गन रखी थी, लेकिन उसे चलाने वाला कोई विशेषज्ञ नहीं था। तभी हवलदार टिनजोंग लामा आगे आए।

उन्होंने तुरंत RCL की पूरी जांच की, उसे साफ किया, लोड किया और निशाना साधा। पहला ही गोला सीधा चीनी HMG बंकर पर जाकर लगा। धमाके के साथ दुश्मन की वह मशीन गन हमेशा के लिए शांत हो गई जो कहर बरपा रही थी। चीनी सैनिक स्तब्ध रह गए। टिनजोंग लामा यहीं नहीं रुके। उन्होंने लगातार फायरिंग जारी रखी और युद्ध का रुख ही पलट दिया।

{ भारतीय सेना की जीत और सम्मान }

30 सितंबर की आधी रात को लेफ्टिनेंट कर्नल के.बी. जोशी और लेफ्टिनेंट कर्नल महातम सिंह के नेतृत्व में भारतीय टुकड़ियों ने जवाबी हमला किया। 1 अक्टूबर की भोर में "जय महाकाली, आयो गोरखाली" के युद्धघोष के साथ तिरंगा फिर पॉइंट 15450 पर लहरा रहा था। चीनी 3 किमी पीछे खदेड़ दिए गए। इस असाधारण साहस, तकनीकी दक्षता और युद्ध के बीच शांत दिमाग से सही निर्णय लेने के लिए हवलदार टिनजोंग लामा को वीर चक्र से सम्मानित किया गया। वीर चक्र भारत का तीसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है।

उसी युद्ध में शहीद राइफलमैन देबी प्रसाद लिम्बू को भी मरणोपरांत वीर चक्र मिला, और लेफ्टिनेंट कर्नल महातम सिंह को महावीर चक्र। हवलदार टिनजोंग लामा की कहानी हमें सिखाती है कि युद्ध सिर्फ जोश से नहीं, प्रशिक्षण, सूझबूझ और सही समय पर सही हथियार चलाने के कौशल से जीते जाते हैं।

जय हिन्द, जय गोरखा

4 days ago | [YT] | 205

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1 अक्टूबर 2026 : 7/11 Gorkha Rifles के वीर चक्र विजेता राइफलमैन देबी प्रसाद लिम्बू, चो ला का अमर बलिदानी

दीपक राई
वीर गोरखा न्यूज नेटवर्क
1962 की हार के घाव को भारत कभी भूला नहीं था। लेकिन 1967 में सिक्किम की बर्फीली चोटियों पर भारतीय जवानों ने ऐसा पराक्रम दिखाया कि चीन को मुंह छिपाना पड़ा। उसी पराक्रम की अमर गाथा का नाम है राइफलमैन देबी प्रसाद लिम्बू, जिन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

{ परिचय और सैन्य जीवन }

देबी प्रसाद लिम्बू भारतीय सेना की 7/11 गोरखा राइफल्स में राइफलमैन के पद पर तैनात थे। गोरखा रेजिमेंट का युद्धघोष है, "जय महाकाली, आयो गोरखाली" और देबी प्रसाद ने अपने अंतिम क्षणों तक इस घोष को सार्थक किया।

{ 1967 का नाथू ला और चो ला संघर्ष }

1967 से पहले सिक्किम एक स्वतंत्र राज्य था, जिसकी सुरक्षा भारत करता था। चीन सिक्किम को भी अरुणाचल की तरह अपना हिस्सा मानता था। सितंबर 1967 में नाथू ला में भारत और चीन के बीच भीषण झड़प हुई थी, जिसमें मेजर जनरल सगत सिंह राठौड़ के नेतृत्व में भारत ने चीन को करारा जवाब दिया था। नाथू ला से कुछ किलोमीटर दूर चो ला में भी तनाव चरम पर था। यहां 10 जम्मू कश्मीर राइफल्स की जगह लेने के लिए 7/11 गोरखा राइफल्स की बटालियन मेजर कुलभूषण जोशी के नेतृत्व में पहुंची थी।

{ 1 अक्टूबर 1967: वह निर्णायक दिन }

आधिकारिक वीर चक्र साइटेशन के अनुसार:

"Rifleman Debi Prasad Limbu was the forward sentry in a platoon post in the Cho La area on the 1 October 1967. When the Chinese suddenly opened fire with heavy machine gun, mortars, rocket launcher, rifles, LMGs and grenades, he kept on firing at the Chinese."

उस दिन की कहानी और भी विस्तृत है। चो ला में सीमा पर एक 30 इंच ऊंचा पत्थर था। भारत उसे सीमा रेखा मानता था, चीन अपना हिस्सा। 1 अक्टूबर को नायब सूबेदार ज्ञान बहादुर लिम्बू का पैर अनजाने में उस पत्थर पर पड़ गया। चीनी सैनिकों ने आपत्तिजनक भाषा में विरोध किया और एक चीनी सैनिक ने ज्ञान बहादुर पर हमला कर दिया।

अपने वरिष्ठ का अपमान गोरखा सैनिक सह न सके। एक सिपाही ने खुकरी से हमलावर का हाथ ही काट डाला। इसके बाद चीनी सेना ने भारी मशीन गन, मोर्टार, रॉकेट लॉन्चर और ग्रेनेड से अचानक फायर खोल दिया।

{ अदम्य पराक्रम और वीरगति }

इसी भीषण गोलीबारी के बीच फॉरवर्ड सेंटी देबी प्रसाद लिम्बू अपनी पोस्ट पर डटे रहे। उन्होंने लगातार चीनियों पर फायरिंग जारी रखी। जब स्थिति बिगड़ने लगी तो वह अकेले खुकरी लेकर दुश्मन की मोर्चाबंद पोजीशन पर टूट पड़े। उन्होंने आमने-सामने की लड़ाई में कई चीनी सैनिकों को धराशायी किया। 'जय महाकाली आयो गोर्खाली' के सिंहनाद के साथ वह रुद्रगण की तरह लड़े, लेकिन अंत में घावों से वीरगति को प्राप्त हुए।

उसी युद्ध में पॉइंट 15,450 पर हवलदार टिनजोंग लामा ने भी असाधारण साहस दिखाया, उन्हें भी वीर चक्र मिला। लेफ्टिनेंट कर्नल महातम सिंह को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। रात में गोरखा राइफल्स और जम्मू-कश्मीर राइफल्स की संयुक्त टुकड़ी ने धावा बोलकर पॉइंट 15,450 पर पुनः कब्जा किया और चीनियों को अंतरराष्ट्रीय सीमा से तीन किलोमीटर पीछे खदेड़ दिया।

{ मरणोपरान्त वीर चक्र }

1 अक्टूबर 1967 के इस कार्य के लिए राष्ट्रपति ने राइफलमैन देबी प्रसाद लिम्बू को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया। वीर चक्र भारत का तीसरा सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है। उनके साथ हवलदार टिनजोंग लामा को भी वीर चक्र मिला। यह सम्मान इस बात का प्रतीक है कि 1962 के बाद भारतीय सेना ने अपना मनोबल कैसे पुनः स्थापित किया।

{ विरासत }

चो ला का युद्ध आज भी चीन बात करने से हिचकता है। माओ जेडोंग अपने शक्ति के शिखर पर थे, तब एक सैन्य दृष्टि से दुर्बल माने जाने वाले देश से हार उनके लिए बड़ी शर्म थी। देबी प्रसाद लिम्बू जैसे वीरों की कहानी हर भारतीय बालक को 1971 के युद्ध की तरह कंठस्थ होनी चाहिए। वह गोरखा परंपरा के सच्चे प्रतिनिधि थे, जिन्होंने खुकरी की धार से दुश्मन के हौसले पस्त कर दिए। उनका बलिदान हमें याद दिलाता है कि सिक्किम आज भारत का अभिन्न अंग है, तो उसके पीछे चो ला और नाथू ला के इन अमर बलिदानियों का लहू है।

वीर चक्र विजेता शहीद देबी प्रसाद लिम्बू को नमन ।

4 days ago | [YT] | 155

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दार्जीलिंग : 107 इन्फैंट्री बटालियन (टेरिटोरियल आर्मी) 11 गोरखा राइफल्स का 67वां RAISING DAY

भारतीय सेना की गौरवशाली 11 गोरखा राइफल्स परिवार की 107 टेरिटोरियल आर्मी (107 TA) जिसको हम गोरखा टेरियर्स के नाम से जानते है का 67वां स्थापना दिवस मनाया गया। गोरखा टेरियर्स ने कमांडिंग ऑफिसर द्वारा ध्वजारोहण किया गया। इस कार्यक्रम में पूर्व सैनिक सम्मिलित हुए । बटालियन का मुख्यालय जलपहाड़, दार्जिलिंग में स्थित है और यह भारतीय सेना की पूर्वी कमान (Eastern Command) के अंतर्गत आती है। यह बटालियन देश की सुरक्षा, रक्षा कार्यों और राष्ट्रीय विकास में सहायता करने के साथ-साथ समय-समय पर क्षेत्रीय युवाओं के लिए 107 इन्फैंट्री बटालियन ने दार्जिलिंग में टीए भर्ती रैली का आयोजन किया भर्ती रैलियों का आयोजन करती है।

107 इन्फैंट्री बटालियन (टेरिटोरियल आर्मी) 11 गोरखा राइफल्स, जिसे 'गोरखा टेरियर्स' (Gorkha Terriers) भी कहा जाता है, की स्थापना 1 अक्टूबर 1960 को काटापहाड़ (दार्जिलिंग), पश्चिम बंगाल में हुई थी। यह यूनिट भारतीय सेना की एकमात्र गोरखा प्रादेशिक बटालियन (Gorkha TA Battalion) है। इसने अपने गठन के बाद से 1962, 1965 और 1971 के युद्धों सहित कई महत्वपूर्ण सैन्य ऑपरेशनों में सक्रिय भूमिका निभाई है।

4 days ago | [YT] | 116

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समग्र गोर्खाली समाजलाई गोर्खाहित कार्य निम्ति सहयोग गर्ने अपील

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Name : Deepak Rai
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Regards
Deepak Rai
Editor
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4 days ago | [YT] | 71