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सुन्दरकाण्ड पाठ व भजन संध्या की शुरुवात :
जनवरी 2017 से मेने अंतर्प्रेरणा से सुन्दरकाण्ड पाठ व भजन संध्या की शुरुवात की है । मेरे जीवन का लक्ष्य भारतीय संस्कृति का घर घर प्रचार करना है , मनुष्य जीवन बड़े भाग्य से मिलता है इसीलिए हमे : हरिनाम संकीर्तन" में नाम जप करके अपने जीवन की सफल बनाना चाहिए , "हरिनाम ही सार ,बाकी सब व्यर्थ पसार।।
"कलयुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर नर उतरहि पारा ।। Contact For Harinaam sankirtan,Last Prayer & Shradhanjli sabha Meditation workshop, Session, Stress management camp, Bhajan Sandhya, Sai kirtan, Mata ki chocki programs. Ph: 8700410217
Vipul Garg - Yuva Motivational Speaker
शर्मनाक है यह, जेल प्रशासन ने बापूजी को परोल पर बाहर निकालने के लिए दो महीने का अतिरिक्त समय लिया उसके ऊपर ना कोई कानूनी कार्यवाही हुई ! ना कुछ हुआ? लेकिन 4-5 घंटे अगर वृद्ध संत 87 के पहुंचने में तकनीकी कारणों से विलंब हुआ तो अब कहानी बनाई जा रही है कैसा रद्दी कानून? #asarambapu #sant #asaramji bapu
1 day ago | [YT] | 133
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Vipul Garg - Yuva Motivational Speaker
अपडेट : आदेश के बाद आज सेंट्रल जेल में आसाराम बापु जी को करना होगा... जोधपुर एयरलिफ्ट हुए बापू जी
2 days ago | [YT] | 867
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Vipul Garg - Yuva Motivational Speaker
Happy Navratri.. #jaimatadi jaimaa. #bhajankirtan #kirtan #bhajan contact 8700410217
1 week ago | [YT] | 86
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Vipul Garg - Yuva Motivational Speaker
Hariom
1 week ago | [YT] | 1,540
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Vipul Garg - Yuva Motivational Speaker
Aaj k darshan 8 october 2026
3 weeks ago (edited) | [YT] | 960
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Vipul Garg - Yuva Motivational Speaker
संत आसाराम बापू की 20 दिन की पैरोल पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश। राजस्थान हाईकोर्ट ने पैरोल आदेश पर तत्काल अमल के निर्देश दिए। 3 अगस्त के आदेश का कड़ाई से पालन और आसाराम बापू की वास्तविक रिहाई सुनिश्चित करने को कहा। सरकार से अनुपालन रिपोर्ट तलब। अगली सुनवाई अक्टूबर के तीसरे सप्ताह में।#Asarambapu #Jodhpur #RajasthanHighCourt #BreakingNews
3 weeks ago | [YT] | 107
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Vipul Garg - Yuva Motivational Speaker
pujya bapu ji ke darshan 💥💥💥👍👍👍🙏🏾🙏🏾
3 weeks ago | [YT] | 1,435
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Vipul Garg - Yuva Motivational Speaker
hariom
1 month ago | [YT] | 80
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Vipul Garg - Yuva Motivational Speaker
राधे राधे
*राधा अष्टमी*
के पावन पर्व पर राधा नाम संकीर्तन!
समय शाम 4 बजे से
19 सितम्बर 2026 शनिवार
स्थान: राजापुरी, मटियाला। दिल्ली
M 50,Gali no 7 som bazar Road near Pawan Rathi Office rajapuri, Delhi
1 month ago | [YT] | 75
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Vipul Garg - Yuva Motivational Speaker
हाईकोर्ट की पैरोल के बाद भी रिहाई में देरी, प्रशासन से जवाब मांगने की जरूरत क्यों पड़ी?
जोधपुर | 25 अगस्त 2026
आसाराम बापू की पैरोल का मामला अब केवल एक कैदी की रिहाई का विषय नहीं रह गया है। यह सवाल भी सामने है कि जब राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से 20 दिन की पैरोल मंजूर कर दी, तो उसके बाद भी रिहाई की प्रक्रिया क्यों नहीं पूरी हो सकी?
3 अगस्त 2026 को राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम बापू को 20 दिन की पैरोल मंजूर की थी। अदालत ने उनकी उम्र, लंबी अवधि से चल रहे कारावास और पूर्व में मिली अंतरिम राहत के दौरान उनके आचरण सहित कई पहलुओं पर विचार किया।
राज्य सरकार की ओर से पैरोल का विरोध किया गया था। गुजरात में लंबित मामले और अन्य प्रशासनिक-सुरक्षा संबंधी आपत्तियां भी अदालत के सामने रखी गईं। लेकिन हाईकोर्ट ने इन आपत्तियों को पैरोल से इनकार का पर्याप्त आधार नहीं माना।
यहीं से प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े होते हैं।
आदेश अदालत का, लेकिन रिहाई में देरी क्यों?
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी तत्काल रिहाई नहीं हुई।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जेल प्रशासन की ओर से गुजरात में लंबित मामले और आदेश के क्रियान्वयन से जुड़े कानूनी पहलुओं का हवाला दिया गया।
लेकिन यदि प्रशासन के पास ऐसा कोई ठोस कानूनी आधार था, जिसके कारण हाईकोर्ट द्वारा मंजूर पैरोल के बावजूद रिहाई रोकी जा सकती थी, तो सवाल यह है कि वह आधार अदालत के सामने कितना प्रभावी था और उसका लिखित रिकॉर्ड क्या है?
क्योंकि अदालत ने राज्य सरकार की आपत्तियों पर विचार करने के बाद ही पैरोल मंजूर की थी।
8 अगस्त को हाईकोर्ट को फिर हस्तक्षेप करना पड़ा
पैरोल के बावजूद रिहाई नहीं होने का मुद्दा दोबारा हाईकोर्ट पहुंचा।
8 अगस्त को अदालत ने राज्य सरकार से जवाब मांगा कि पैरोल मंजूर होने के बावजूद रिहाई क्यों नहीं की गई। मामले में अगली सुनवाई के लिए 17 अगस्त की तारीख तय की गई।
यह घटनाक्रम अपने आप में महत्वपूर्ण है।
अगर प्रशासनिक प्रक्रिया सामान्य रूप से चल रही थी, तो अदालत को रिहाई में देरी का कारण पूछने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
यही वह प्रश्न है जिसका जवाब सरकार और जेल प्रशासन को स्पष्ट रूप से देना चाहिए।
प्रशासन की आपत्तियां पहले ही अदालत के सामने थीं
यह भी ध्यान देने योग्य है कि पैरोल का विरोध करते समय राज्य सरकार ने अपनी आपत्तियां अदालत के सामने रखी थीं।
अदालत ने उन दलीलों को सुना और उसके बाद पैरोल मंजूर की।
ऐसे में बाद में उसी मामले से जुड़े प्रशासनिक या कानूनी आधारों के कारण रिहाई में देरी होती है, तो यह स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करता है कि क्या न्यायालय के आदेश के क्रियान्वयन में प्रशासनिक स्तर पर कोई अतिरिक्त अड़चन पैदा हुई?
यदि हां, तो उसका जिम्मेदार कौन था और वह अड़चन किस नियम के तहत थी?
“SP ने पैरोल रोक दी” दावे की भी जांच जरूरी
सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा है कि SP स्तर पर पैरोल रोकी गई।
लेकिन अभी उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर किसी एक अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
फिर भी प्रशासन से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि:
रिहाई की अंतिम अनुमति किस स्तर पर लंबित थी?
क्या कोई लिखित रोक आदेश जारी हुआ?
यदि हुआ तो उसे किस अधिकारी ने जारी किया?
उस आदेश का कानूनी आधार क्या था?
और क्या उसकी जानकारी हाईकोर्ट को दी गई?
अगर ऐसा कोई लिखित आदेश मौजूद नहीं है, तो फिर रिहाई में हुई देरी का प्रशासनिक आधार क्या था?
सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही को भी अलग रखना होगा
6 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में आसाराम बापू की चिकित्सा आधार पर राहत से जुड़ी कार्यवाही हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत नहीं दी, लेकिन जेल में उनकी पसंद के प्रशिक्षित caretaker की अनुमति दी।
यह कार्यवाही राजस्थान हाईकोर्ट की 20 दिन की पैरोल से अलग थी।
इसलिए प्रशासन यदि गुजरात या सुप्रीम कोर्ट की किसी अन्य कार्यवाही को पैरोल के क्रियान्वयन में बाधा के रूप में देख रहा था, तो उसका स्पष्ट कानूनी आधार सार्वजनिक होना चाहिए।
सवाल सिर्फ देरी का नहीं, जवाबदेही का है
किसी भी दोषसिद्ध व्यक्ति को लेकर प्रशासन अपनी सुरक्षा और कानून-व्यवस्था संबंधी चिंताएं रख सकता है। लेकिन जब वही आपत्तियां न्यायालय के सामने रखी जा चुकी हों और अदालत अपना आदेश दे चुकी हो, तब उस आदेश के बाद की प्रशासनिक प्रक्रिया भी पारदर्शी होनी चाहिए।
किसी न्यायालय के आदेश को लागू करने में यदि वास्तविक कानूनी बाधा है, तो सरकार को उसे स्पष्ट करना चाहिए।
यदि कोई प्रशासनिक प्रक्रिया लंबित है, तो उसकी समयसीमा बताई जानी चाहिए।
और यदि किसी अधिकारी के स्तर पर देरी हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
न्यायिक आदेश और प्रशासनिक इच्छा के बीच अंतर नहीं होना चाहिए।
अब सरकार से सीधे सवाल
1. 3 अगस्त के पैरोल आदेश के बाद रिहाई में देरी का वास्तविक कारण क्या था?
2. क्या सरकार या जेल प्रशासन ने कोई लिखित आदेश जारी करके रिहाई रोकी या स्थगित की?
3. यदि ऐसा आदेश था, तो उसका कानूनी आधार क्या था?
4. गुजरात के लंबित मामले को राजस्थान की हाईकोर्ट-स्वीकृत पैरोल के क्रियान्वयन में किस प्रावधान के तहत बाधा माना गया?
5. 8 अगस्त को हाईकोर्ट को सरकार से जवाब क्यों मांगना पड़ा?
6. 17 अगस्त के बाद मामले में क्या कार्रवाई हुई?
7. यदि लगातार नई तारीखें पड़ रही हैं, तो पैरोल की 20 दिन की अवधि का वास्तविक लाभ कैसे सुनिश्चित होगा?
इन सवालों का जवाब किसी समर्थक या विरोधी पक्ष से नहीं, बल्कि राज्य सरकार और जेल प्रशासन के आधिकारिक रिकॉर्ड से आना चाहिए।
निष्कर्ष
इस पूरे घटनाक्रम में अदालत का आदेश सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
हाईकोर्ट ने पैरोल पर विचार किया, सरकार की आपत्तियां सुनीं और उसके बाद 20 दिन की पैरोल मंजूर की।
इसके बावजूद रिहाई में देरी हुई और मामला दोबारा अदालत पहुंचा।
इससे कम से कम इतना सवाल तो बनता ही है कि न्यायालय के आदेश के बाद प्रशासनिक स्तर पर ऐसा क्या हुआ कि रिहाई तत्काल नहीं हो सकी?
यह किसी व्यक्ति विशेष के प्रति पक्षधरता का सवाल नहीं है।
यह सवाल है न्यायिक आदेश की प्रभावशीलता और प्रशासनिक जवाबदेही का।
और यदि सरकार के पास रिहाई में देरी का कोई ठोस कानूनी आधार है, तो उसे सार्वजनिक करने में संकोच नहीं होना चाहिए।
क्योंकि अदालत का आदेश स्पष्ट हो, लेकिन उसके बाद भी रिहाई तारीखों और प्रक्रियाओं में उलझी रहे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
2 months ago | [YT] | 896
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