मेरी आँख भर आई थी, जब मैंने दी को आज, कुर्सी पर बैठे देखा।
भवाली शहर में एक चाय बागान है, प्रेमा दी, इसके रिसेप्शन पर आपको मिल जाएगी। मुस्कुराती हुई,चाय बागान के बारे में बड़े इत्मीनान और ख़ुशी से बताती हुई। जब हम छोटे थे, मुहल्ले भर के सारे भाइयों को बटोर कर स्कूल से घर लाती थी यह। कहने को हमारे ताऊ जी की बेटी थी लेकिन हम भाई बहनों में कभी ऐसा लगा ही नहीं कि यह हमारा सगा ख़ून नहीं है। शादी बारात तो इसलिए अच्छे लगते हैं कि इसमें सारे भाई बहन मिल जाते हैं। मैं नवी में था, दी की शादी हो गई थी। फिर वह अपने ससुराल में व्यस्त हो गई और हम अपनी ज़िंदगी में। शादी बरातों में ज़रूर हम सब, साथ में परिवार हो जाते थे लेकिन जब वक़्त रोटियाँ कमाने का हो, तब रिश्ते निभाने का समय किसे मिलता है!!
जीजाजी गाड़ी चलाते थे और दी घर सम्हालती थी लेकिन दी का मन सिर्फ़ घर सम्हालने से नहीं भरा, उसे जीजाजी को और सपोर्ट करना था और शायद अपने पैरों पर खड़ा होना था। इसलिए अपने घर से थोड़ी दूर पर, दी ने अपने ससुराल में ही, इस चाय बागान में काम करना शुरू कर दिया।
शुरुआत छोटी ही थी, बागान की देखभाल करना, खरपतवार निकालना, बोझ उठाना यह कह लो कि मुश्किल से मुश्किल काम जो यहाँ हो सकते थे, वह करती रहती थी।
मेरे कॉलेज के टाइम में मेरी मम्मी ने भी इसी चाय बागान में ख़ूब मज़दूरी की थी इसलिए मुझे पता है, यहाँ काम करने में कितनी तकलीफ़ होती है। आज भी माँ के पैरों में दर्द रहता है।
पर कहते हैं समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता, दी ने काम करते हुए ऑफिस के काम भी सीखे घर भी संभाला बच्चों को भी देखा और आज वह प्रमोट होकर चाय बागान को रिप्रेजेंट करती है। रिसेप्शन की कुर्सी पर बैठती हैं।
हो सकता है किसी के लिए यह बहुत बड़ी बात ना हो पर दी के लिए है मेरे लिए है तरक्की करता हर अपना आपको ख़ुशी ही देता है,
हम बड़े शौक से आज यहाँ घूमे और हमने यहाँ ख़ूब तस्वीरें भी खिंचवायी, और दी भी एक एक जगह के बारे में ऐसे बता रही थी जैसे वह अपने छोटे भाई को अपनी दुनिया दिखाना चाहती हो। वैसे आप कभी भवाली के चाय बगान जायें तो प्रेमा दी से मिलिएगा और कहिएगा -दी आप बहुत हिम्मती हो,
घर की रसोई में पुवे पूरी, खीर और हलुवा सब बन चुके हैं
ईजा (माँ) पाँच बजे उठ गई थी और पिताजी भी थोड़ी देर में ही जाग गए थे तब से दोनों लगे हुए थे काम में। सुबह गौशाला के काम से लेकर पूजा पाठ का काम आज का दिन बहुत व्यस्त भरा है घर में। आज पारायण है नवरात्रि का इष्टों को भोग लगता है इसलिए पूरा परिवार मंदिर में आया हुआ है। हमारे घर में गोल्ज्यू और मैया का मंदिर है पूरे परिवार का त्योहार यही चढ़ता है। रज्जो गौरी बीच बीच में भोंक रहे हैं ताकि अपनी उपयोगिता साबित करते रहें। दाज्यू को छुट्टी नहीं है वह ड्यूटी गए हैं मैं और प्रेम भाई अपने कारोबार में लगे हैं
मेरी भतीजी यक्षु आज अपने खिलौने ले आई है उसने हमारे स्टूडियो पर क़ब्ज़ा कर लिया है। बीच बीच में पूछती है -चाचू, चाची कब आयेंगी वह मेरे लिए डॉल कब लायेंगी??
मैं उसको टाल रहा हूँ पर वह मेरी तरह ज़िद्दी है।
आज पूरा परिवार इकट्ठा हुआ हमने ख़ूब भजन गए कन्या खिलायी सब ख़ुश दिख रहे थे नवरात्र में
जब ख़ुशियाँ आती हैं तब दादू की कमी साफ़ महसूस होती है त्योहार जब आते हैं हम सोचते हैं वह भी होते तो कितना अच्छा होता पर सोचने से क्या होता है जो होना होता है वह शायद पहले से लिखा होता है।
NSD एक ऐसी जगह है, जहाँ जाकर आपको लगता है आप किसी दूसरी दुनिया में आ गए हैं।
कितनी बार इसके दरवाज़े से लौट आया था मैं। थियेटर के दिनों में, मलिक साहब बहुत बातें करते थे यहाँ की।
आने वाले वक़्त में जितने भी कलाकारों से मिला, सबने यहाँ की कहानी सुनाई। मैं पहली बार गया था एनएसडी के भीतर इस बार सिनेमा के कलाकार, जो थियेटर की ज़मीन से निकले थे उनसे मिलना हुआ और जिस इंसान की कहानियों का मुझ पर सबसे ज़्यादा असर हुआ है उसी के साथ स्टेज साझा करने का मौक़ा मिला।
इम्तियाज़ की तमाशा का असर इतना ज़्यादा हुआ मुझ पर कि कुछ बरस पहले नौकरी छोड़कर मैं पहाड़ों पर चले आया।
यहीं स्टूडियो है मेरा।
इस बार जब इम्तियाज़ सामने थे, मैं बस इत्मीनान से सुन रहा था उनको।
बात करते हुए, वो कभी, शरारती हो जाते तो कभी, अपनी दुनिया में खोने लगते। उनकी बातें, बस सुनते रहने का मन था लेकिन वक्त की एक सीमा होती है और वह वक्त कहाँ गुज़र गया, पता ही नहीं चला।
दिल्ली शहर से दूर, एक शहर में बैठा हुआ इन तस्वीरों को देख रहा हूँ अब लग रहा है
पिछले कुछ दिन बहुत सुखद रहे, दिल्ली की हवा को अगर इग्नोर कर दिया जाए, तो हमको इस बार इस शहर ने बहुत कुछ दिया। nsd से कई बार गुज़रना हुआ लेकिन इस बार उसके स्टेज ने बुलाया। हिंदी सिनेमा के कलाकारों से बात करना उन्हें समझना जितना अच्छा लगा उससे ज़्यादा अच्छा था राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का माहौल चितरंजन साहेब का निर्देशन और बज्जिका भाषा में बनी फ़िल्म आजूर और उसके कलाकार। सत्यम बहुत लंबे समय से कह रहा था आप NSD आना और इस बार हम हो आए। कैंटीन बहुत प्यारी है वहाँ आपको बिल्कुल कॉलेज वाला फील आता है। मुझे तो लग रहा था मैं उम्र में कई बरस छोटा हो गया हूँ, और इन्हीं लोगों के साथ पढ़ने लगा हूँ। कैंटीन में मुलाक़ात हुई, नीलेश मिसरा साहब से। रेडियो में कितना सुना था उनको आज सामने देखा तो सब कुछ सुन्न सा हो गया। स्कूल के दिन हों या नैनीताल के थियेटर के दिन इनकी कहानियों ने हमेशा हाथ पकड़कर हिम्मत दी है मुझे। आज भी जब लगता है नींद नहीं आ रही इनकी कोई रिकॉर्डिंग चला लेता हूँ। कुछ लोगों की आवाज़ में एक अलग सा सुकून होता है इनकी आवाज़ वैसी ही है। इनको सुनने वाले पढ़ने वाले और समझने वाले इन जैसे ही शान्त हो जाते हैं। बहुत बातें की हमने नैनीताल, याद शहर, रेडियो, गाँव कनेक्शन और भारत भर में कहानियों की यात्राओं की। मन के भाव इतने खुल कर बताए मैंने कि कुछ रह ना जाए लेकिन फिर भी बहुत कुछ रह गया। कुछ लोगों से बातें कभी ख़त्म नहीं होती।
अब अहमदाबाद में हूँ लाइट कैमरा एक्शन के एक काम से आया हूँ शायद महीने के अंत तक पहली वेब सीरीज देखने को मिले आपको। दिल्ली का ख़ुमार अब तक दिमाग़ में सवार है, कुछ मुलाक़ातें कभी नहीं भुलायी जाती।
जन्मदिन के साथ उम्र के कैलेंडर में आज, एक और साल जुड़ गया। पहाड़ों में जन्म लेने की वजह से
जन्मदिन को लेकर मन में कोई ख़ास एहसास रहा नहीं बचपन से, लेकिन कहते हैं आपकी ज़िंदगी को आपके आस पास के लोग बनाते हैं। रात बारह बजे से जो संदेशों का सिलसिला शुरू हुआ वह अब तक जारी है
कुछ को जवाब दे सका कुछ के बाक़ी हैं जिनको जवाब नहीं दे पाया उनसे हाथ जोड़कर माफ़ी।
माँ के हाथों बनी पूड़ी सब्ज़ी पिताजी का प्रेम भाई का दिया तोहफ़ा
सुखी पाजी का पहले कॉल से लेकर प्रेम के बाहर चलने की ज़िद को न कहकर
यह जन्मदिन बहुत ख़ास हो गया। फिर दोस्त यार भाई परिवार और हर एक सुनने वाले पढ़ने वाले ने इसे बहुत ही ख़ास बना दिया।
बहुत से फ़ोन कॉल आए बहुत से msg आए सबको बस इतना ही कहना है
मैं एक बहुत आम इंसान हूँ लेकिन आपने मुझे सर आँखों पर बिठा कर रखा है, बस एक ही प्रार्थना है, प्यार बनाये रखना।
मैं हमेशा साथ हूँ एक दोस्त, भाई और अपने की भूमिका में।
और हाँ एक और बात
अगले महीने से हम अपने लाइव शो शुरू कर रहे हैं तो शायद इस बार हम बैठ कर बहुत सी बातें कर सकेंगे।
दिसंबर की इकत्तीस तारीख़ थी सुबह के नौ बजे थे, प्रेम और मैं तैयार थे अपनी यात्रा के लिए। यह हिमांचल का हमारा पहला ट्रैक था।
सफ़र एस्केप के पूरे ग्रुप के साथ हम त्रियुंड ट्रैक करने जा रहे थे। होटल की बालकनी से दिख रहे पहाड़ बहुत सुंदर लग रहे थे। पिछले दो दिन बस की यात्राओं में निकले थे इसलिए आज की सुबह सुंदर थी। ठण्डियों के मौसम में समय का पता नहीं चलता इसलिए सुबह के नौ बजे भी ज़्यादा नहीं लग रहे थे।
पहला बैच रवाना हुआ बीस लोगों का फिर दूसरा और आख़िर में गए हम।
आदतों से पहाड़ी हैं तो हमसे हल्के चलना हो ही नहीं पाता। प्रेम वैसे तो सतना का है लेकिन अब पहाड़ में रहते हुए वह मुझसे ज़्यादा पहाड़ी हो गया है।
हम बहुत तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रहे थे
हमारे आस पास वालों के हिसाब से हम उड़ कर जा रहे थे।
इस ट्रैक में हमनें बेहिसाब शोर्ट रास्ते इस्तेमाल किए और कब पहाड़ की ऊंचाइयों पर पहुंच गए पता नहीं चला। एक दो बार साँस ज़रूर फूल रही थी लेकिन थोड़ी देर रुक कर ठीक हो जा रही थी।
चले थे सबसे आख़िर में और पहुँचे सबसे पहले। मैं प्रेम और थका हुआ प्रियांशु हमारे साथ था।
वहाँ से पहाड़ों का दृश्य बहुत सुंदर था ऐसा लगा जैसे हिमाल नज़र भर दूर है और हम उसे छू लेंगे।
इस नज़ारे ने हर थकान उतार दी।
हमारा कैम्प नाग देवता के मंदिर के पास था इसलिए हम वापस नीचे उतरे कैम्प में आते ही नींद आ गई।
अगली सुबह चार बजे आँख खुली बाहर बहुत सुंदर आसमान था।
शुभांकर, प्रियांशी, प्रेम और मैं दोबारा से ऊपर चढ़ना शुरू किए। अंधेरे में पहाड़ चढ़ने का मज़ा ही कुछ और था। हमने टोर्च बुझा ली और चाँद की रौशनी में आगे बढ़ने लगे।
सुबह पहाड़ों को उठते हुए देखना बहुत प्यारा एहसास था। आज सूर्योदय बादलों से ढका हुआ था दिन तक बर्फ पड़ने के आसार थे। त्रियुंड के बोर्ड के बाद हम आगे बढ़ते गए और वहाँ पहुँचे जहाँ इंसानों के निशान नहीं थे एक प्यारा साथी (शेरू) उस सफ़र में हमारे साथ चलने लगा हमने उसे भोलू नाम दिया। पहाड़ी के सबसे ऊँचे स्थान पर प्रेम मैं और शेरू ही थे।
हमने तस्वीर निकाली और नीचे उतर आए। त्रियुंड बहुत सुंदर है लेकिन मेरी शिकायत है हिमांचल वालों से
इस ट्रैक में कूड़े को एक जगह पर इकट्ठा करने को क्यों नहीं कहते आप ज़ोर देकर। यहाँ जाने वाला टूरिस्ट या ट्रैवलर ख़ुद अपनी ज़िम्मेदारी क्यों नहीं समझता क्यों यहाँ इतना प्लास्टिक और कूड़ा फेंका हुआ है।
समय है एक ज़िम्मेदार मुसाफ़िर बनकर इन पहाड़ों को बचाये रखने का नहीं तो आने वाले समय में त्रियुंड ट्रैक भी प्लास्टिक और कूड़े से घिरा हुआ सफ़र मात्र रह जाएगा।
उम्मीद है ज़िम्मेदार लोग अपनी ज़िम्मेदारी निभायेंगे और एक दिन ऐसा ज़रूर होगा जब पहाड़ों पर प्लास्टिक का नामोनिशान नहीं होगा।
कुछ तस्वीरें इस ट्रैक की जो यादगार रही थी। - पंकज जीना
बनारस को मैं कैसे कहूँ कि, यह सिर्फ़ शहर है। बीते दिनों से बस दौड़ भाग में, शहरों से मिल रहे हैं, ऐसे में इस शहर से मिलना, ठहर जाने जैसा था। कुछ दिनों पहले जब @banjara_banarsi का फ़ोन आया बनारस आने के लिए तो हमारे लिए मुश्किल था बहुत, ज़िंदगी व्यस्त चल रही थी और सच कहें तो हमारा मन भी नहीं था बनारस आने का।
पर बनारस आने के लिए आपका मन नहीं बुलावा चाहिए होता है। महादेव की आज्ञा हुई और हम चले आए।
@abhimonk7 ने पहले ही कह दिया था, भैया बनारस आयेंगे तो बता दीजियेगा, अभिषेक का तो जैसे हक़ है हम पर।
फिर बरेली से ट्रेन में बैठकर @premsomvanshi17 और हम चले आए बनारस। कैंट पर उतरकर सबसे पहले हमने कहा महादेव, यहाँ की धरती को।
उसके बाद आ गए हम @banjara_banarsi के होमस्टे @kashi.niwasi में।
यह नानी के घर जैसा लगता है, यहाँ एक बाग़ीचा है प्यारा सा, जो मुझे बनारस में भी गाँव का एहसास कराता है। फिर Sid की बातें इस गेस्ट हाउस को चौपाल बना देती हैं। शाम यहीं हो गई थी, फिर हम घाट पर चले गए। एक नेटवर्क नहीं था फ़ोन पर, और भीड़ हद से ज़्यादा छोटे भाई सत्यम की नाव ढूँढने में एक घंटा लग गया।
पर वह इंतज़ार बेहतर था, नाव से बनारस देखना स्वर्ग देखने जैसा था। पहली बार ऐसी रौशनी मैंने इलाहाबाद में देखी थी, माघ मेला और महाकुंभ के समय।
तब सुखी पाजी ने कहा था - चलो तुमको तारें दिखाते हैं।
कल सुखी की बहुत याद आई, बनारस देखते हुए।
आसमान में पटाखों की रौशनी देखी, लेज़र शो देखा और नावों की टक्कर देखी। सब एकदम मज़ेदार था।
फिर देखते ही देखते रात हो आई और होमस्टे आने तक रात के एक बज गए थे। मुश्किल से दो घंटा सोए होंगे कि @premsomvanshi17 को उठा कर मैं, सुबह ए बनारस देखने चला गया। घाट वाक करते हुए अस्सी से हम दशाश्वमेध गए फिर अभिषेक के साथ हम पुराने बनारस से मिले। बनारस में भीड़ बहुत है लेकिन यहाँ यह भीड़ भी सुंदर है अगर आपको इस शहर से प्यार है। बस कुछ लोग हॉर्न बहुत बजाते हैं, इधर उधर थूक देते हैं, कुल मिलाकर बनारस से प्यार करने वाले, बनारस का ख़याल रखना शुरू कर दें तो बनारस को सुकून का शहर बनने से, कोई नहीं रोक सकता।
फिलहाल बनारस से बहुत सारा प्रेम आपको।
आप किस शहर में हैं, यह ज़रूर बताइयेगा। क्या आप कभी बनारस आए हैं ? यह भी बताइए।
Pankaj Jeena
Big Boss ke Saath baatcheet 🤍
2 months ago | [YT] | 29
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Pankaj Jeena
मेरी आँख भर आई थी, जब मैंने दी को आज, कुर्सी पर बैठे देखा।
भवाली शहर में एक चाय बागान है,
प्रेमा दी,
इसके रिसेप्शन पर आपको मिल जाएगी।
मुस्कुराती हुई,चाय बागान के बारे में
बड़े इत्मीनान और ख़ुशी से बताती हुई।
जब हम छोटे थे,
मुहल्ले भर के सारे भाइयों को
बटोर कर स्कूल से घर लाती थी यह।
कहने को हमारे ताऊ जी की बेटी थी
लेकिन हम भाई बहनों में
कभी ऐसा लगा ही नहीं
कि यह हमारा सगा ख़ून नहीं है।
शादी बारात तो इसलिए अच्छे लगते हैं
कि इसमें सारे भाई बहन मिल जाते हैं।
मैं नवी में था, दी की शादी हो गई थी।
फिर वह अपने ससुराल में व्यस्त हो गई
और हम अपनी ज़िंदगी में।
शादी बरातों में ज़रूर हम सब,
साथ में परिवार हो जाते थे
लेकिन जब वक़्त रोटियाँ कमाने का हो,
तब रिश्ते निभाने का समय किसे मिलता है!!
जीजाजी गाड़ी चलाते थे
और दी घर सम्हालती थी
लेकिन दी का मन सिर्फ़ घर सम्हालने से नहीं भरा,
उसे जीजाजी को और सपोर्ट करना था
और शायद अपने पैरों पर खड़ा होना था।
इसलिए अपने घर से थोड़ी दूर पर,
दी ने
अपने ससुराल में ही,
इस चाय बागान में काम करना शुरू कर दिया।
शुरुआत छोटी ही थी, बागान की देखभाल करना, खरपतवार निकालना, बोझ उठाना
यह कह लो कि
मुश्किल से मुश्किल काम
जो यहाँ हो सकते थे,
वह करती रहती थी।
मेरे कॉलेज के टाइम में
मेरी मम्मी ने भी
इसी चाय बागान में ख़ूब मज़दूरी की थी
इसलिए मुझे पता है,
यहाँ काम करने में कितनी तकलीफ़ होती है।
आज भी माँ के पैरों में दर्द रहता है।
पर कहते हैं समय
हमेशा एक जैसा नहीं रहता,
दी ने काम करते हुए
ऑफिस के काम भी सीखे
घर भी संभाला
बच्चों को भी देखा
और आज वह प्रमोट होकर
चाय बागान को रिप्रेजेंट करती है।
रिसेप्शन की कुर्सी पर बैठती हैं।
हो सकता है किसी के लिए
यह बहुत बड़ी बात ना हो
पर दी के लिए है
मेरे लिए है
तरक्की करता हर अपना
आपको ख़ुशी ही देता है,
हम बड़े शौक से
आज यहाँ घूमे
और हमने यहाँ ख़ूब
तस्वीरें भी खिंचवायी,
और दी भी एक एक जगह के बारे में
ऐसे बता रही थी
जैसे वह अपने छोटे भाई को
अपनी दुनिया दिखाना चाहती हो।
वैसे आप कभी
भवाली के चाय बगान जायें
तो प्रेमा दी से मिलिएगा
और कहिएगा
-दी आप बहुत हिम्मती हो,
4 months ago | [YT] | 1,443
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Pankaj Jeena
@NeeleshMisra साहेब की फ़िल्म आई है, देखिए इसे और बताइए
कैसी लगी ??
5 months ago | [YT] | 11
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Pankaj Jeena
घर की रसोई में
पुवे पूरी, खीर और हलुवा
सब बन चुके हैं
ईजा (माँ) पाँच बजे उठ गई थी
और पिताजी भी थोड़ी देर में ही जाग गए थे
तब से दोनों
लगे हुए थे काम में।
सुबह गौशाला के काम से लेकर
पूजा पाठ का काम
आज का दिन बहुत व्यस्त भरा है
घर में।
आज पारायण है
नवरात्रि का
इष्टों को भोग लगता है
इसलिए
पूरा परिवार मंदिर में आया हुआ है।
हमारे घर में
गोल्ज्यू और मैया का मंदिर है
पूरे परिवार का त्योहार
यही चढ़ता है।
रज्जो गौरी
बीच बीच में भोंक रहे हैं
ताकि अपनी उपयोगिता साबित करते रहें।
दाज्यू को छुट्टी नहीं है
वह ड्यूटी गए हैं
मैं और प्रेम भाई
अपने कारोबार में लगे हैं
मेरी भतीजी यक्षु आज
अपने खिलौने ले आई है
उसने हमारे स्टूडियो पर
क़ब्ज़ा कर लिया है।
बीच बीच में पूछती है
-चाचू, चाची कब आयेंगी
वह मेरे लिए डॉल कब लायेंगी??
मैं उसको टाल रहा हूँ
पर वह मेरी तरह ज़िद्दी है।
आज पूरा परिवार इकट्ठा हुआ
हमने ख़ूब भजन गए
कन्या खिलायी
सब ख़ुश दिख रहे थे
नवरात्र में
जब ख़ुशियाँ आती हैं
तब दादू की कमी
साफ़ महसूस होती है
त्योहार जब आते हैं
हम सोचते हैं
वह भी होते
तो कितना अच्छा होता
पर सोचने से क्या होता है
जो होना होता है
वह शायद
पहले से लिखा होता है।
- मुखर
6 months ago | [YT] | 1,155
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Pankaj Jeena
पप्पू दा और दादा जी के नाम 🤍
7 months ago | [YT] | 32
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Pankaj Jeena
कहानीकार और उसकी बातें।
NSD एक ऐसी जगह है,
जहाँ जाकर आपको लगता है
आप किसी दूसरी दुनिया में आ गए हैं।
कितनी बार इसके दरवाज़े से लौट आया था मैं।
थियेटर के दिनों में, मलिक साहब
बहुत बातें करते थे यहाँ की।
आने वाले वक़्त में
जितने भी कलाकारों से मिला,
सबने यहाँ की कहानी सुनाई।
मैं पहली बार गया था एनएसडी के भीतर इस बार
सिनेमा के कलाकार,
जो थियेटर की ज़मीन से निकले थे
उनसे मिलना हुआ
और जिस इंसान की कहानियों का मुझ पर
सबसे ज़्यादा असर हुआ है
उसी के साथ
स्टेज साझा करने का मौक़ा मिला।
इम्तियाज़ की तमाशा का असर
इतना ज़्यादा हुआ मुझ पर
कि कुछ बरस पहले नौकरी छोड़कर
मैं पहाड़ों पर चले आया।
यहीं स्टूडियो है मेरा।
इस बार जब इम्तियाज़ सामने थे,
मैं बस इत्मीनान से सुन रहा था उनको।
बात करते हुए, वो कभी, शरारती हो जाते तो कभी, अपनी दुनिया में खोने लगते।
उनकी बातें, बस सुनते रहने का मन था
लेकिन वक्त की एक सीमा होती है
और वह वक्त कहाँ गुज़र गया, पता ही नहीं चला।
दिल्ली शहर से दूर, एक शहर में बैठा हुआ
इन तस्वीरों को देख रहा हूँ
अब लग रहा है
कहीं यह कोई
सपना तो नहीं था।
- पंकज जीना
8 months ago | [YT] | 470
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Pankaj Jeena
पिछले कुछ दिन बहुत सुखद रहे,
दिल्ली की हवा को अगर इग्नोर कर दिया जाए,
तो हमको इस बार इस शहर ने बहुत कुछ दिया।
nsd से कई बार गुज़रना हुआ
लेकिन इस बार
उसके स्टेज ने बुलाया।
हिंदी सिनेमा के कलाकारों से बात करना
उन्हें समझना जितना अच्छा लगा
उससे ज़्यादा अच्छा था
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का माहौल
चितरंजन साहेब का निर्देशन
और बज्जिका भाषा में बनी फ़िल्म आजूर
और उसके कलाकार।
सत्यम
बहुत लंबे समय से कह रहा था
आप NSD आना
और इस बार हम हो आए।
कैंटीन बहुत प्यारी है वहाँ
आपको बिल्कुल
कॉलेज वाला फील आता है।
मुझे तो लग रहा था
मैं उम्र में कई बरस
छोटा हो गया हूँ,
और इन्हीं लोगों के साथ पढ़ने लगा हूँ।
कैंटीन में मुलाक़ात हुई,
नीलेश मिसरा साहब से।
रेडियो में कितना सुना था उनको
आज सामने देखा तो
सब कुछ सुन्न सा हो गया।
स्कूल के दिन हों
या नैनीताल के थियेटर के दिन
इनकी कहानियों ने
हमेशा हाथ पकड़कर हिम्मत दी है मुझे।
आज भी जब लगता है
नींद नहीं आ रही
इनकी कोई रिकॉर्डिंग चला लेता हूँ।
कुछ लोगों की आवाज़ में
एक अलग सा सुकून होता है
इनकी आवाज़ वैसी ही है।
इनको सुनने वाले
पढ़ने वाले
और समझने वाले
इन जैसे ही
शान्त हो जाते हैं।
बहुत बातें की हमने
नैनीताल, याद शहर, रेडियो, गाँव कनेक्शन
और भारत भर में कहानियों की यात्राओं की।
मन के भाव इतने
खुल कर बताए मैंने
कि कुछ रह ना जाए
लेकिन फिर भी
बहुत कुछ रह गया।
कुछ लोगों से बातें
कभी ख़त्म नहीं होती।
अब अहमदाबाद में हूँ
लाइट कैमरा एक्शन के एक काम से आया हूँ
शायद महीने के अंत तक
पहली वेब सीरीज देखने को मिले आपको।
दिल्ली का ख़ुमार
अब तक दिमाग़ में सवार है,
कुछ मुलाक़ातें
कभी नहीं भुलायी जाती।
- पंकज जीना
8 months ago | [YT] | 555
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Pankaj Jeena
13 January 2026,
जन्मदिन के साथ उम्र के कैलेंडर में आज,
एक और साल जुड़ गया।
पहाड़ों में जन्म लेने की वजह से
जन्मदिन को लेकर
मन में
कोई ख़ास एहसास रहा नहीं
बचपन से,
लेकिन कहते हैं
आपकी ज़िंदगी को
आपके आस पास के लोग बनाते हैं।
रात बारह बजे से
जो संदेशों का सिलसिला शुरू हुआ
वह अब तक जारी है
कुछ को जवाब दे सका
कुछ के बाक़ी हैं
जिनको जवाब नहीं दे पाया
उनसे हाथ जोड़कर माफ़ी।
माँ के हाथों बनी पूड़ी सब्ज़ी
पिताजी का प्रेम
भाई का दिया तोहफ़ा
सुखी पाजी का पहले कॉल से
लेकर
प्रेम के बाहर चलने की ज़िद को न कहकर
यह जन्मदिन
बहुत ख़ास हो गया।
फिर दोस्त यार भाई परिवार
और हर एक सुनने वाले
पढ़ने वाले ने
इसे बहुत ही ख़ास बना दिया।
बहुत से फ़ोन कॉल आए
बहुत से msg आए
सबको बस इतना ही कहना है
मैं एक बहुत आम इंसान हूँ
लेकिन आपने
मुझे सर आँखों पर बिठा कर रखा है,
बस एक ही प्रार्थना है,
प्यार बनाये रखना।
मैं हमेशा साथ हूँ
एक दोस्त,
भाई
और अपने की भूमिका में।
और हाँ एक और बात
अगले महीने से
हम अपने लाइव शो शुरू कर रहे हैं
तो शायद इस बार हम
बैठ कर बहुत सी बातें कर सकेंगे।
हमेशा प्यार देने के लिए आभार।
तुम्हारा
- पंकज जीना
9 months ago | [YT] | 1,070
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Pankaj Jeena
दिसंबर की इकत्तीस तारीख़ थी
सुबह के नौ बजे थे,
प्रेम और मैं
तैयार थे अपनी यात्रा के लिए।
यह हिमांचल का हमारा
पहला ट्रैक था।
सफ़र एस्केप के पूरे ग्रुप के साथ
हम त्रियुंड ट्रैक करने जा रहे थे।
होटल की बालकनी से दिख रहे पहाड़ बहुत
सुंदर लग रहे थे।
पिछले दो दिन बस की यात्राओं में निकले थे
इसलिए आज की सुबह सुंदर थी।
ठण्डियों के मौसम में
समय का पता नहीं चलता
इसलिए सुबह के नौ बजे भी
ज़्यादा नहीं लग रहे थे।
पहला बैच रवाना हुआ बीस लोगों का
फिर दूसरा और आख़िर में गए हम।
आदतों से पहाड़ी हैं
तो हमसे हल्के चलना हो ही नहीं पाता।
प्रेम वैसे तो सतना का है
लेकिन अब पहाड़ में रहते हुए
वह मुझसे ज़्यादा पहाड़ी हो गया है।
हम बहुत तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रहे थे
हमारे आस पास वालों के हिसाब से
हम उड़ कर जा रहे थे।
इस ट्रैक में हमनें बेहिसाब शोर्ट रास्ते इस्तेमाल किए
और कब पहाड़ की ऊंचाइयों पर पहुंच गए पता नहीं चला।
एक दो बार साँस ज़रूर फूल रही थी
लेकिन थोड़ी देर रुक कर
ठीक हो जा रही थी।
चले थे सबसे आख़िर में
और पहुँचे सबसे पहले।
मैं प्रेम और थका हुआ प्रियांशु हमारे साथ था।
वहाँ से पहाड़ों का दृश्य
बहुत सुंदर था
ऐसा लगा जैसे हिमाल
नज़र भर दूर है और हम
उसे छू लेंगे।
इस नज़ारे ने हर थकान उतार दी।
हमारा कैम्प नाग देवता के मंदिर के पास था
इसलिए हम वापस नीचे उतरे
कैम्प में आते ही नींद आ गई।
अगली सुबह चार बजे आँख खुली
बाहर बहुत सुंदर आसमान था।
शुभांकर, प्रियांशी, प्रेम और मैं
दोबारा से ऊपर चढ़ना शुरू किए।
अंधेरे में पहाड़ चढ़ने का मज़ा ही कुछ और था।
हमने टोर्च बुझा ली
और चाँद की रौशनी में आगे बढ़ने लगे।
सुबह पहाड़ों को उठते हुए देखना
बहुत प्यारा एहसास था।
आज सूर्योदय बादलों से ढका हुआ था
दिन तक बर्फ पड़ने के आसार थे।
त्रियुंड के बोर्ड के बाद हम आगे बढ़ते गए
और वहाँ पहुँचे
जहाँ इंसानों के निशान नहीं थे
एक प्यारा साथी (शेरू)
उस सफ़र में हमारे साथ चलने लगा
हमने उसे भोलू नाम दिया।
पहाड़ी के सबसे ऊँचे स्थान पर
प्रेम मैं और शेरू ही थे।
हमने तस्वीर निकाली
और नीचे उतर आए।
त्रियुंड बहुत सुंदर है
लेकिन मेरी शिकायत है
हिमांचल वालों से
इस ट्रैक में कूड़े को एक जगह पर इकट्ठा करने को
क्यों नहीं कहते आप ज़ोर देकर।
यहाँ जाने वाला टूरिस्ट या ट्रैवलर
ख़ुद अपनी ज़िम्मेदारी क्यों नहीं समझता
क्यों यहाँ इतना प्लास्टिक और कूड़ा फेंका हुआ है।
समय है
एक ज़िम्मेदार मुसाफ़िर बनकर
इन पहाड़ों को बचाये रखने का
नहीं तो आने वाले समय में
त्रियुंड ट्रैक भी
प्लास्टिक और कूड़े से घिरा हुआ
सफ़र मात्र रह जाएगा।
उम्मीद है
ज़िम्मेदार लोग अपनी ज़िम्मेदारी निभायेंगे
और एक दिन ऐसा ज़रूर होगा
जब पहाड़ों पर प्लास्टिक का नामोनिशान नहीं होगा।
कुछ तस्वीरें इस ट्रैक की
जो यादगार रही थी।
- पंकज जीना
9 months ago | [YT] | 383
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Pankaj Jeena
बनारस को मैं कैसे कहूँ कि,
यह सिर्फ़ शहर है।
बीते दिनों से बस दौड़ भाग में,
शहरों से मिल रहे हैं,
ऐसे में इस शहर से मिलना,
ठहर जाने जैसा था।
कुछ दिनों पहले जब
@banjara_banarsi का फ़ोन आया
बनारस आने के लिए
तो हमारे लिए मुश्किल था बहुत,
ज़िंदगी व्यस्त चल रही थी
और सच कहें तो
हमारा मन भी नहीं था
बनारस आने का।
पर बनारस आने के लिए आपका मन नहीं
बुलावा चाहिए होता है।
महादेव की आज्ञा हुई और हम चले आए।
@abhimonk7 ने पहले ही कह दिया था,
भैया बनारस आयेंगे तो बता दीजियेगा,
अभिषेक का तो जैसे हक़ है हम पर।
फिर बरेली से ट्रेन में बैठकर
@premsomvanshi17 और
हम चले आए बनारस।
कैंट पर उतरकर सबसे पहले हमने कहा महादेव,
यहाँ की धरती को।
उसके बाद आ गए हम @banjara_banarsi के होमस्टे @kashi.niwasi में।
यह नानी के घर जैसा लगता है,
यहाँ एक बाग़ीचा है प्यारा सा,
जो मुझे बनारस में भी गाँव का एहसास कराता है।
फिर Sid की बातें इस गेस्ट हाउस को चौपाल बना देती हैं।
शाम यहीं हो गई थी, फिर हम घाट पर चले गए।
एक नेटवर्क नहीं था फ़ोन पर, और भीड़ हद से ज़्यादा
छोटे भाई सत्यम की नाव ढूँढने में एक घंटा लग गया।
पर वह इंतज़ार बेहतर था, नाव से बनारस देखना
स्वर्ग देखने जैसा था।
पहली बार ऐसी रौशनी मैंने
इलाहाबाद में देखी थी,
माघ मेला और
महाकुंभ के समय।
तब सुखी पाजी ने कहा था
- चलो तुमको तारें दिखाते हैं।
कल सुखी की बहुत याद आई, बनारस देखते हुए।
आसमान में पटाखों की रौशनी देखी, लेज़र शो देखा
और नावों की टक्कर देखी।
सब एकदम मज़ेदार था।
फिर देखते ही देखते रात हो आई और होमस्टे आने तक रात के एक बज गए थे।
मुश्किल से दो घंटा सोए होंगे कि @premsomvanshi17 को उठा कर मैं,
सुबह ए बनारस देखने चला गया।
घाट वाक करते हुए अस्सी से हम दशाश्वमेध गए
फिर अभिषेक के साथ हम
पुराने बनारस से मिले।
बनारस में भीड़ बहुत है
लेकिन यहाँ यह भीड़ भी सुंदर है अगर आपको इस शहर से प्यार है।
बस कुछ लोग हॉर्न बहुत बजाते हैं,
इधर उधर थूक देते हैं,
कुल मिलाकर बनारस से प्यार करने वाले,
बनारस का ख़याल रखना शुरू कर दें
तो बनारस को सुकून का शहर बनने से, कोई नहीं रोक सकता।
फिलहाल बनारस से बहुत सारा प्रेम आपको।
आप किस शहर में हैं, यह ज़रूर बताइयेगा।
क्या आप कभी बनारस आए हैं ?
यह भी बताइए।
11 months ago | [YT] | 347
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