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* Advocate Supreme Court of India
* Director, International Council of Jurists, London
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Panel Lawyer for Dr. Bhim Rao Ambedkar University, Sonipat, Haryana, @Supreme Court, Punjab National Bank, Small Industrial Development Bank, (SIDBI), Central Bank and Energy Efficiency Services Ltd, GOI.




4C Supreme Law

कानूनी सवाल:
अगर आपने किसी बिल्डिंग में फ्लैट खरीदा और बाद में पता चला कि वह अवैध (Unauthorized) या 5वीं मंजिल पर बना है और उस पर MCD का सीलिंग नोटिस आ गया, तो आप सबसे पहले क्या करेंगे? ⚖️🏛️

🗳️ पोल विकल्प:
1️⃣ बिल्डर से तुरंत पूरा रिफंड मांगेंगे
2️⃣ Consumer Court या RERA में केस करेंगे
3️⃣ बिल्डर के खिलाफ पुलिस में 420/FIR कराएंगे
4️⃣ कोर्ट/ट्रिब्यूनल से स्टे (Stay) लेने की कोशिश करेंगे

💬 अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट्स में ज़रूर बताएं!

1 day ago | [YT] | 3

4C Supreme Law

हमनें भी ठोक रखा है MCD में complaint देखना है क्या रंग लाता है ज़माना?

5 days ago | [YT] | 4

4C Supreme Law

Delhi's group housing societies are about to face the largest legal decision in their existence.
The Master Plan for Delhi 2047 was notified by the Central Government on 20 August 2026. It provides for the redevelopment of group housing complexes and schemes across the National Capital Territory of Delhi. By public notice dated 12 September 2026, the Delhi Development Authority has invited Resident Welfare Associations, federations of RWAs and Cooperative Group Housing Societies to an awareness and appraisal programme on Monday, 14 September 2026, from 4:30 pm to 6:00 pm, at the DDA Auction Hall, Ground Floor, D Block, Vikas Sadan, INA. Only one representative of each society is permitted.
Office bearers should go, and they should go alert. Redevelopment is a legal question long before it becomes a construction question. Four matters must be settled before a society signs anything: the consent threshold and the validity of the general body resolution, the terms and the security under the developer agreement, the position of members who do not consent, and the approvals required from the Registrar of Cooperative Societies. Leasehold status and RERA registration follow close behind.
One clarification, because the confusion has already started. MPD-2047 operates within the NCT of Delhi. Societies in Noida, Ghaziabad, Gurugram and Faridabad are governed by their own State statutes and their own authorities. Nothing in this Plan applies to them.
Developers will arrive with presentations. Societies should arrive with questions.
#MPD2047 #DDA #GroupHousing #RWA #DelhiRedevelopment #PropertyLaw

1 week ago | [YT] | 3

4C Supreme Law

आज का अख़बार खोलिए। पूरे पन्ने का एक विज्ञापन मिलेगा। बड़े अक्षरों में दाम। बड़े अक्षरों में दावा।
अब अख़बार को नब्बे डिग्री घुमाइए। हाशिये पर, खड़ी लाइन में, बहुत महीन अक्षरों में कुछ लिखा मिलेगा। वही लिखा हुआ आपको बताता है कि छूट केवल दो दिन की थी, केवल एक क्षेत्र में थी, और तस्वीर केवल दिखाने भर की थी।
यह संयोग नहीं है। यह तरीक़ा है।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(28) कहती है कि ज़रूरी जानकारी को जान-बूझकर छिपाना भी भ्रामक विज्ञापन है। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण की वर्ष 2022 की गाइडलाइंस का खंड 11 कहता है कि अस्वीकरण उसी भाषा में होगा, उसी फ़ॉन्ट में होगा, और ऐसी जगह होगा जहाँ पाठक की नज़र पड़े।
अगली बार ऐसा विज्ञापन दिखे तो वह पन्ना फाड़कर रख लीजिए। तारीख़, संस्करण और पृष्ठ संख्या लिख लीजिए।
शिकायत पर एक पैसा ख़र्च नहीं होता। 1915 पर फ़ोन कीजिए, या consumerhelpline.gov.in पर दर्ज कराइए।

1 week ago | [YT] | 3

4C Supreme Law

मेरी दादी का सफ़र

आज से ठीक एक हफ़्ते पहले, पिछले शनिवार को मेरी दादी इस दुनिया से चली गईं। उनका निधन लगभग 80–82 वर्ष की आयु में हुआ। 80–82 साल का उनका जीवन अपने आप में एक बहुत लंबा और खूबसूरत सफ़र था। उन्होंने इस जीवन में बहुत पीड़ाएँ सहीं, बहुत कष्ट झेले, लेकिन कभी हार नहीं मानी। सच कहूँ तो, वह हमारे घर की आयरन लेडी थीं।

उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में बहुत कुछ सहा, लेकिन उनकी उम्मीदें हमेशा सिर्फ़ दो चीज़ों से जुड़ी रहीं—

1. एक खुशहाल, एकजुट और बड़ा परिवार।
2. अपने बच्चों की तरक्की और खुशहाली।

उनकी ज़िंदगी के सफ़र में मैंने उन्हें सिर्फ़ पिछले 27 सालों से जाना। लेकिन अगर उनकी उम्र से नहीं, बल्कि उनके जीवन के अनुभवों से उन्हें मापूँ, तो शायद मैंने उन्हें उनकी पूरी ज़िंदगी में से केवल कुछ ही पलों के लिए जाना था। और उन पलों में भी मैंने उनके दोनों सपनों को पूरा होते देखा है।

उनके सबसे बड़े पुत्र ने मेहनत की और पूरे परिवार के लिए एक राह बनाई। उस राह पर चलते हुए उनकी बेटियाँ, बहुएँ और बेटे गाँव से निकलकर दिल्ली और बेंगलुरु तक अपने-अपने जीवन में आगे बढ़े और अपने लिए एक मुकाम बनाया।

उनकी दोनों बेटियों ने अपना गृहस्थ जीवन वैसे ही संभाला, जैसे उन्होंने अपनी माँ को इतने वर्षों तक संभालते हुए देखा और सीखा था। पांडेय परिवार की बहुएँ आईं और उन्होंने भी अपनी पूरी ज़िंदगी अपनी सास को माँ जैसा सम्मान दिया और इस परिवार को एकजुट रखने में अपना योगदान दिया।

मेरी दादी सिर्फ़ एक अच्छी दादी ही नहीं थीं, बल्कि एक अच्छी सास भी थीं।

हाँ, एक सास के रूप में उनसे भी गलतियाँ हुईं और एक बहू के रूप में घर की बहुओं से भी। लेकिन दोनों ने मिलकर फिर भी इस परिवार को जोड़े रखा। समय के साथ एक-दूसरे को समझा, एक-दूसरे के अनुसार खुद को बदला और एक-दूसरे के साथ ढलती चली गईं।

जितना बड़ा योगदान इस घर को एकजुट रखने में मेरी माँ और चाचियों का है, उतना ही बड़ा योगदान मेरे दादा-दादी का भी है। चाहे कोई इस बात को माने या न माने, मेरे दादा-दादी ने अपनी बहुओं को समय के साथ आज़ादी भी दी और सम्मान भी।

जिस ज़माने के सास-ससुर के किस्से मैंने सुने हैं, उस ज़माने के हिसाब से उन्होंने खुद को बहुत बदला। अपनी बहुओं को प्यार दिया, उन्हें आगे बढ़ने दिया और धीरे-धीरे रिश्तों को उस रूप में ढाला, जिसमें पूरा परिवार साथ रह सके।

मेरी दादी की लव लैंग्वेज थी—पूजा-पाठ, बच्चों को आशीर्वाद देना और तरह-तरह के नए-नए व्यंजन बनाकर खिलाना।

मेरे दादू की लव लैंग्वेज थी—हमें पढ़ाना, नई चीज़ें सिखाना और हमारे साथ नई चीज़ें सीखने के बहाने समय बिताना। और मैं उनकी सबसे बड़ी पोती होने के नाते इसका सबसे ज़्यादा लाभ उठाने वालों में से एक रही।

दादी के साथ चुपके से शॉपिंग पर जाना हो, लिविंग रूम को थिएटर बनाकर फ़िल्म देखना हो, अख़बार से रेसिपी की कटिंग निकालकर उनके साथ रसोई में बनाना हो, दादू के साथ स्कूल जाना हो, या हर मंगलवार उनके बूंदी के प्रसाद का इंतज़ार करना हो—ऐसी अनगिनत नादानियों और छोटी-छोटी खुशियों को मैंने अपने बचपन में उनके साथ सबसे ज़्यादा जिया है।

अगर मैं अपने दादा-दादी के बारे में लिखती रहूँ, तो शायद यह लेख कभी ख़त्म ही न हो।

लेकिन आज मैं सिर्फ़ उनके बारे में लिखने नहीं आई हूँ।

आज मैं उनके सफ़र के बारे में लिखने आई हूँ।

उस सफ़र के बारे में, जिसमें वह हमें शरीक तौर पर छोड़कर जा चुकी हैं।



कहते हैं कि जब इस धरती से जाने का समय पास आता है, तो आख़िरी कुछ दिनों में इंसान का पूरा जीवन उसकी आँखों के सामने से गुज़रने लगता है।

शायद कुछ ऐसा ही मेरी दादी के साथ उनके गुज़रने से ठीक एक हफ़्ते पहले हो रहा था, जिसे हम उस समय समझ नहीं पाए।

उस दिन जब मैं उनसे मिली, तो वह बार-बार मेरा नाम ले रही थीं।

मुझे लगा कि शायद मैं काफ़ी दिनों बाद उनसे मिली हूँ, इसलिए दादी मुझे बार-बार बुला रही हैं।

लेकिन आज सोचती हूँ—क्या पता उस समय वह मेरे साथ बिताए हर एक लम्हे को अपनी आँखों के सामने देख रही हों।

क्या पता वह उस छोटी अनन्या को पुकार रही हों, जिसके पीछे-पीछे घूमकर वह उसे खाना खिलाती थीं, जिसके साथ शॉपिंग जाती थीं और जिसके साथ उन्होंने अपना बचपन फिर से जिया था।

उनके गुज़रने से पहले के उस एक हफ़्ते में मेरे पूरे परिवार ने कुछ ऐसे लम्हे देखे और महसूस किए, जिन्हें हम उस समय समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसा क्यों हो रहा है।

लेकिन उनके जाने के बाद अचानक सब कुछ समझ आने लगा।

ऐसा लगा जैसे ईश्वर और दादी, दोनों मिलकर हमें कुछ संकेत दे रहे थे।

शायद हमें आने वाले दिनों के लिए तैयार किया जा रहा था।



आज रुककर सोचती हूँ तो मन में एक ख़याल आता है।

और आगे जो मैं लिख रही हूँ, वह सिर्फ़ मेरी कल्पना है—मेरी दादी के आगे के सफ़र की।

दादी अपने जाने से लगभग एक हफ़्ते पहले से कह रही थीं कि अगले हफ़्ते मेरी पोती की शादी है और वह सबको न्योता दे रही थीं।

अब लगता है कि वह न्योता शायद असल में अपनी डोली उठने का न्योता था।

पिछले चार सालों में, मेरे दादू के जाने के बाद, पूरा परिवार होते हुए भी वह कहीं न कहीं अकेली पड़ गई थीं।

शायद अब वह अपने सारे दायित्व निभाकर, अपने बच्चों-पोतों को आशीर्वाद देकर, हमें खुद को संभालने के लिए तैयार करके और अपनी डोली उठवाकर वापस अपने जीवनसाथी के पास चली गई हैं।

इस बार उनकी विदाई पर हम सब दुखी थे।

वह हमें देखकर शायद थोड़ी परेशान भी थीं।

लेकिन फिर भी, एक मीठे से दर्द को अपने भीतर लिए वह अपने सफ़र पर आगे बढ़ती रहीं।

और जाते-जाते भी हमें अपने आशीर्वाद के साथ हिम्मत देती रहीं।

शायद वह हमसे कह रही हों—

“बबुआ, खुद को संभालो।
माला, तुम हिम्मत रखना और परिवार की हिम्मत बनना। सबको एकजुट रखना।
बेबी, तुम खुद को संभालो। तुम बहुत हिम्मत वाली हो। अब तुम्हें ही सारी रीत अपनी भाभी और बच्चों को संभालनी है।
डॉली, समृद्धि और समस्त परिवार—तुम सबने मेरी बहुत सेवा की है। लेकिन अब मैं आज़ाद होकर और तुम सबको भी आज़ाद करके जा रही हूँ।
एकजुट परिवार का सपना मैंने इसलिए देखा था कि मेरे बाद तुम सब एक-दूसरे का सहारा और हिम्मत बनो।”

शायद इन तेरह दिनों के सफ़र में मेरी दादी इसी तरह आगे बढ़ती जा रही होंगी।

हर दिन अपनी मंज़िल के थोड़ा और करीब।

उनकी मंज़िल है—मेरे दादू।

और उनके वे सभी पूर्वज, जो उन्हें लेने आए होंगे।

शायद वह उनके पास पहुँचकर अब उनके साथ अपने आगे का जीवन बिताने जा रही हैं।

आगे बढ़ते हुए जब उन्हें भूख या प्यास लगती होगी, तो वह थोड़ी देर रुकती होंगी। उनके बच्चे जो मनपसंद भोजन उन्हें अर्पित करते हैं, उसे ग्रहण करती होंगी और फिर अपने सफ़र पर आगे बढ़ जाती होंगी।

और इस पूरे सफ़र के बीच, शायद कभी-कभी नीचे धरती की ओर देखकर यह भी देखती होंगी कि उनके बच्चे, पोते-पोतियाँ अब अपने जीवन में वापस लौट आए हैं।

सब खुश हैं।

सब साथ हैं।

किसी को कोई तकलीफ़ नहीं है।

और यह देखकर वह फिर हमें अपना आशीर्वाद देती होंगी और आगे बढ़ जाती होंगी।



मेरी दादी ने कभी नौकरी नहीं की।

लेकिन उन्होंने जीवन में कमाया बहुत कुछ है।

उन्होंने रिश्ते कमाए।

प्यार कमाया।

इज़्ज़त कमाई।

उनकी विदाई पर उनसे मिलने और उन्हें अंतिम विदाई देने आए लोगों में बहुत से ऐसे लोग थे, जिनसे वह शायद बहुत कम मिली थीं। कुछ ऐसे भी थे, जिनसे वह शायद कभी मिली ही नहीं थीं।

फिर भी, उन्होंने अपने बच्चों को जो संस्कार दिए, अपनी बहू-बेटियों को जिस तरह मिल-जुलकर और खुशहाली से रहना सिखाया, उसी के माध्यम से उन्होंने पूरे समाज का प्यार और सम्मान कमाया।

शायद यही किसी इंसान की सबसे बड़ी कमाई होती है।



वैसे तो गरुड़ पुराण में इस सफ़र में मेरी दादी अभी कहाँ हैं, किस पड़ाव पर हैं—यह सब बताया जा रहा है।

लेकिन जिस इंसान ने अपना पूरा जीवन धर्म, पूजा-पाठ, प्रेम और सेवा में बिताया हो।

जिसने कभी जान-बूझकर किसी का बुरा न किया हो।

जहाँ गलती हुई हो, वहाँ पश्चाताप करने की कोशिश की हो।

ऐसे इंसान की यात्रा इस धरती लोक से जाने के बाद भी सुखद ही होती है।

और मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी दादी को मोक्ष की प्राप्ति हो चुकी है।



मुझे लगता है कि स्वर्गलोक में मेरे दादा-दादी का मिलन हो चुका है।

बस उनकी नोकझोंक हम देख नहीं पा रहे हैं।

इसलिए जो पुरानी नोकझोंक हमने देखी है, उसी को याद करके हँसी के ठहाके लगा लेते हैं।

और शायद वह दोनों हमें ऐसे हँसते हुए देखकर बीच-बीच में ख़ुश हो जाते होंगे।

शायद दादू फिर दादी से कोई छोटी-सी बात पर बहस कर रहे होंगे।

दादी फिर उनसे नाराज़ होने का नाटक कर रही होंगी।

और कुछ देर बाद दोनों फिर साथ बैठकर प्रसाद खा रहे होंगे।

और नीचे हम—

उनकी यादों के सहारे,

उनकी दी हुई सीख के सहारे,

और उनके आशीर्वाद के सहारे

अपना जीवन आगे बढ़ा रहे होंगे।

बस यही है मेरी कल्पना—मेरी दादी के सफ़र की।

एक ऐसा सफ़र, जिसका अंत नहीं हुआ है।

बस रास्ता बदल गया है।

वह हमसे दूर नहीं गई हैं।

वह बस अपने जीवनसाथी के पास, अपने अगले सफ़र पर चली गई हैं।

दादी, आपकी डोली विदा हो गई है।
अब आप जहाँ भी हों, दादू के साथ खुश रहिए।
हम सबको ऐसे ही आशीर्वाद देते रहिए।

आपका सफ़र मंगलमय हो।

ॐ शांति।

1 week ago | [YT] | 6

4C Supreme Law

सत्य निकेतन में सात जानें गईं। उसके बाद 48 घंटे में 67 इमारतें गिराई गईं और 9 सील हुईं।
अब एक सवाल, जो कोई नहीं पूछ रहा।
दिल्ली में यह तय कौन करता है कि कौन सी इमारत बनेगी और कितनी ऊँची बनेगी?
मुख्यमंत्री नहीं। विधानसभा नहीं। आपका विधायक नहीं। पार्षद भी नहीं।
संविधान का Article 239AA दिल्ली को विधानसभा देता है और फिर तीन विषय छीन लेता है। Public order, police, और land. ज़मीन।
यानी दिल्ली का वोटर उस एक भी व्यक्ति को नहीं चुनता जो उसके शहर की ज़मीन पर फ़ैसला लेता है।
बुलडोज़र नीति नहीं होता।
पूरी बात कल, विस्तार से।

1 week ago | [YT] | 7

4C Supreme Law

पैन एशिया टाइम्स न्यूज़ सर्विसेज (PATNS) / नई दिल्ली
नागपुर से दिल्ली राजघाट तक 1500 किमी की जनजागृति पदयात्रा संपन्न
करीब 35 किलो वजन लेकर पैदल चले अनिल चौहान ने मानवता, लोकतंत्र, संविधान और नागरिक ज़िम्मेदारी का दिया संदेश
नई दिल्ली। नागपुर से आरम्भ हुई लगभग 1,500 किलोमीटर लम्बी जनजागृति पदयात्रा रविवार को दिल्ली स्थित राजघाट पहुँचने के साथ सम्पन्न हो गई। वरिष्ठ पत्रकार और पुराने समाजवादी साथी अनिल चौहान ने यह पूरी दूरी करीब 35 किलोग्राम वज़न अपने साथ लेकर पैदल तय की।
अनिल चौहान उस पीढ़ी के हैं जिसने अटल बिहारी वाजपेयी, राम विलास पासवान, मुलायम सिंह यादव और नितिन गडकरी के दौर में सार्वजनिक जीवन को नज़दीक से देखा और उसमें भागीदारी की। लोहिया और जयप्रकाश की परम्परा से निकले इस तबके की पहचान यही रही कि उसने दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर हर धारा के नेतृत्व से संवाद बनाए रखा। पदयात्रा के दौरान भी उन्होंने यही कहा कि सवाल किसी दल का नहीं, नागरिक की ज़िम्मेदारी का है।
यात्रा का संदेश साफ़ था। मानवता, सद्भावना, समता, लोकतंत्र, संविधान और नागरिक ज़िम्मेदारी। चौहान ने रास्ते भर गाँवों, कस्बों और शहरों में लोगों से सीधा संवाद किया और कहा कि संविधान केवल एक दस्तावेज़ नहीं, आम आदमी की सुरक्षा की गारंटी है, और उसे बचाए रखना सरकारों से पहले नागरिकों का काम है।
मार्ग में पुलिस अधिकारियों, स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संगठनों ने यात्रा में सहयोग किया। जगह-जगह स्वागत हुआ और स्थानीय लोग कुछ-कुछ दूरी तक यात्रा में साथ चले। राजघाट पहुँचने पर विभिन्न स्थानों से आए समर्थकों, पत्रकारों, अधिवक्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनकी अगवानी की और महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित की।
यात्रा के समापन पर चौहान ने कहा कि यह किसी एक व्यक्ति की यात्रा नहीं थी, बल्कि उन तमाम लोगों की थी जो आज भी सादगी, ईमानदारी और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा में भरोसा रखते हैं। उन्होंने आगे भी इसी तरह के जनसंवाद कार्यक्रम जारी रखने की बात कही।
इस पदयात्रा की ख़बर सोमवार को दैनिक नवसंदेश (पटना) और बीपीएन टाइम्स सहित कई प्रकाशनों में प्रमुखता से प्रकाशित हुई।
प्रकाशन: पैन एशिया टाइम्स न्यूज़ सर्विसेज (PATNS)
भारत सहित एशियाई देशों के प्रकाशनों का समूह, जो विभिन्न समाचार-पत्रों और चैनलों के लिए प्रिंट तथा वीडियो, दोनों प्रारूपों में समाचार और विचार उपलब्ध कराता है।

2 weeks ago | [YT] | 5

4C Supreme Law

नन्हे,

मां चली गईं।
गया में जन्म, आरा में विवाह, और पूरा जीवन बरौनी में, गंगा के उसी किनारे। अन्तिम दिन दिल्ली में बीते। और मोक्ष मिला गाज़ीपुर में, दिल्ली के उस गाज़ीपुर में, जिसका नाम भी मैंने कभी सुना नहीं था। कभी सोचा भी न था कि उसके पास रहूँगा, और यह भी नहीं कि माँ की अन्तिम यात्रा वहीं पूरी होगी।
गाज़ीपुर में उस दिन जो हुजूम उमड़ा, वह देखने वाली बात थी। कहाँ-कहाँ से लोग आए। पत्रकार, वकील, अधिकारी, राजनेता, मित्र, बन्धु-बान्धव, पड़ोसी। प्रयाग से, बनारस से, न जाने कितने शहरों से, कितने गाँवों से। सब आ गए।
यही तो था माँ का संसार। सबके लिए उनके पास जगह थी, हमेशा। झोली चाहे कितनी भी खाली रही हो, वे पूरी अन्नपूर्णा थीं। कोई खाली नहीं गया। घर से कभी कोई भूखा नहीं लौटा।
पर सबसे विचित्र बात यह रही कि इतनी दूर दिल्ली में भी, बरौनी ही केन्द्र में बना रहा। अस्पताल से लेकर अस्थि विसर्जन तक, सब कुछ जैसे किसी घड़ी की सुई पर चलता रहा। बनारस में राजीव द्विवेदी ने सब कुछ सँभाल लिया, बिना कहे, बिना पूछे। और गाज़ीपुर में पंकज अन्तिम क्षण तक अडिग खड़ा रहा। ये वही लोग हैं जिनसे रिश्ता किसी काग़ज़ पर नहीं लिखा, बस बरौनी की मिट्टी में गड़ा है।
एक महीने पहले की बात है। मेरा बचपन का मित्र राजीव गोयल उनसे मिलने आया। उसने पूछा, आंटी, मैं कौन हूँ। माँ ने पल भर भी नहीं लगाया। बोलीं, नन्हे।
वह नाम, जिसे शायद हम सब खुद ही भूल चुके थे।
अब वे लोग एक-एक कर के जा रहे हैं जो हमें नन्हे, चुन्नू, मुन्ना कह कर पुकारते थे। जिनकी ज़बान पर हमारा असली नाम कभी आया ही नहीं। बचपन के दोस्तों को छोड़ दें, तो अब वह पुकारने वाली पीढ़ी हमसे छूट रही है। और उनके साथ वह नाम भी चला जाता है, जो सिर्फ़ उन्हीं का दिया हुआ था।
उनकी पाँच सन्तानें और हैं। पर मैं तो बस उनका बउवा ही रहा।
आज माँ की अस्थियाँ गंगा में विसर्जित हो गईं। बनारस में, उसी गंगा में, जिसे उन्होंने जीवन भर बरौनी के घाट से देखा था।
माँ, आपने आख़िरी बार नन्हे कहा। वह आवाज़ अब कहीं और से नहीं आएगी।
विनम्र श्रद्धांजलि।
शोक संतप्त पाण्डेय परिवार

2 weeks ago | [YT] | 12

4C Supreme Law

2 weeks ago | [YT] | 5

4C Supreme Law

Adv. Ajay Kummar Supreme Law International g.page/r/CQumC-eZxD89EBM/review

2 weeks ago | [YT] | 3