NEW DIET SYSTEM [ Navi Bhojan Pratha ] NDS Health Center
Dr. Zarna can help you get Heal any kind of illness since she has more than 900 videos on everything . Free of charge advice to Heal any illnesses. We Share health knowledge in easy-to-understand terms, such that you can actually apply it in your life and to improve your health, overcome diseases through holistic healing, or adopt a wholesome, Healthy diet.
I, DR. ZARNA PATEL follower of New Diet System (NDS) [ Navi Bhojan Pratha ] Inspired by Guru Shri BV Chauhan.
Adopt NDS and heal diseases together, as their way to serve humanity and give back the wisdom our society Through healing journeys.
NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel
*आज का विचार*
*प्रलोभनों पर विजय पाना*
*October 24*
वासनायें मनुष्य की सबसे निष्ठुर शत्रु हैं; वह उन्हें तृप्त नहीं कर सकता। केवल ईश्वर को जानने की एकमात्र अभिलाषा रखो। इन्द्रियों की माँगों को सन्तुष्ट करके तुम सन्तुष्ट नहीं हो सकते, क्योंकि इन्द्रियाँ तुम्हारा स्वरूप नहीं हैं, वे तो केवल तुम्हारी सेवक हैं।
— *श्री श्री परमहंस योगानन्द*,
*“परमहंस योगानन्द के वचनामृत”*
3 days ago | [YT] | 7
View 1 reply
NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel
*आज का विचार*
*प्रलोभनों पर विजय पाना*
*October 21*
सबसे बुरा प्रलोभन चंचलता है। क्योंकि वह आपका ध्यान संसार में उलझाकर रखता है और इस प्रकार आपको ईश्वर के ज्ञान से वंचित रखता है। आप यदि नियमित ध्यान करें, तो आप सदा ईश्वर के साथ रहेंगे।
— *श्री श्री परमहंस योगानन्द*,
*योगदा सत्संग पाठ*
6 days ago | [YT] | 12
View 2 replies
NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel
🇮🇳🛑मनुष्य शरीर की प्रकृति शाकाहारी है🛑
🙏मांस खाने वाले वे चलती फिरती कब्रें हैं, जिनमें मारे गये पशुओं की लाशें दफन की गई हैं। - जार्ज बर्नार्ड शाॅ
💯कोई जानवर मनुष्य की भांति भोजन नहीं करता है, प्रत्येक जानवर का अपना भोजन होता है। यदि तुम भैंसों को ले जाओ बगींचे में और उन्हें वहां छोड़ दो, तो वे सिर्फ एक खास तरह का घास ही खाएंगी। वे हर चीज और कोई भी चीज नहीं खाने लगेंगी—वें बहुत चुन कर खाती हैं। अपने भोजन के प्रति उनकी एक सुनिश्चित संवेदनशीलता होती है। मनुष्य बिलकुल भटक गया है, अपने भोजन के प्रति वह बिलकुल संवेदनशील नहीं है। वह हर चीज खाता रहता है। असल में तुम कोई ऐसी चीज नहीं खोज सकते जो मनुष्य द्वारा कहीं न कहीं खाई न जाती हो। कुछ स्थानों में चींटियां खाई जाती हैं, कुछ स्थानों में सांप खाए जाते हैं, कुछ स्थानों में कुत्ते खाए जाते हैं। मनुष्य हर चीज खाता है। मनुष्य तो बस विक्षिप्त है। वह नहीं जानता कि किस चीज का उसके शरीर के साथ मेल बैठता है और किस चीज का मेल नहीं बैठता। वह बिलकुल उलझा हुआ है।
स्वभावत: मनुष्य को शाकाहारी होना चाहिए, क्योंकि उसका पूरा शरीर शाकाहारी भोजन के लिए बना है। वैज्ञानिक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि मनुष्य—शरीर का सारा ढांचा यही बताता है कि मनुष्य को मांसाहारी नहीं होना चाहिए। मनुष्य आया है बंदरों से। बंदर शाकाहारी हैं—पक्के शाकाहारी हैं। यदि डार्विन की बात सच है तो मनुष्य को शाकाहारी होना चाहिए।
अब कई तरीके हैं यह निर्णय करने के कि जानवरों की कोई प्रजाति शाकाहारी है या मांसाहारी : यह निर्भर करता है अंतड़ियों पर, अंतड़ियों की लंबाई पर। मांसाहारी जानवरों की आंत बहुत छोटी होती है। चीता, शेर—उनकी आंत बहुत छोटी होती है, क्योंकि मांस पहले से ही पचाया हुआ भोजन है। उसे पचाने के लिए लंबी आंत नहीं चाहिए। पचाने का काम तो जानवर ने ही पूरा कर दिया है। अब तुम खा रहे हो जानवर का मांस। वह पचाया हुआ ही है, लंबी आंत की जरूरत नहीं है। मनुष्य की आंत बहुत लंबी है : इसका अर्थ हुआ कि मनुष्य शाकाहारी प्राणी है। लंबी पाचन—क्रिया चाहिए, और बहुत कुछ व्यर्थ होता है जिसे बाहर फेंकना होता है।
तो यदि आदमी मांसाहारी नहीं है और वह मांस खाता है, तो शरीर बोझिल हो जाएगा। पूरब में, सभी गहरे ध्यानियों ने—बुद्ध, महावीर—उन्होंने मांसाहार न करने पर बहुत जोर दिया है। अहिंसा की धारणा के कारण नहीं—वह गौण है। लेकिन इस कारण कि यदि तुम सच में ही गहरे ध्यान में उतरना चाहते हो तो तुम्हारे शरीर को निर्भार होने की जरूरत है, स्वाभाविक और प्रवाहापूर्ण होने की जरूरत है। तुम्हारा शरीर हलका होना चाहिए; और मांसाहारी का शरीर बहुत बोझिल होता है।
कभी ध्यान देना कि क्या होता है जब तुम मांस खाते हो : जब तुम किसी पशु को मारते हो तो क्या होता है उसे जब वह मरता है? निश्चित ही, कोई नहीं मरना चाहता। जीवन स्वयं को जारी रखना चाहता है, पशु स्वेच्छा से तो मर नहीं रहा है। अगर कोई तुम्हारी हत्या करे, तो तुम शांति से तो मर नहीं जाओगे। यदि एक सिंह छलांग लगा दे तुम पर और मार डाले तुमको, तो तुम्हारे मन पर क्या गुजरेगी? वैसी ही तकलीफ सिंह को होती है जब तुम सिंह को मारते हो। यंत्रणा, भय, मृत्यु, पीड़ा, चिंता, क्रोध, हिंसा, उदासी—ये सारी चीजें घटित होती हैं जानवर को। उसके सारे शरीर में हिंसा पीड़ा, यंत्रणा फैल जाती है। सारा शरीर विषाक्त तत्वों से, जहर से भर जाता है। शरीर की सारी ग्रंथियां जहर छोड़ देती हैं। क्योंकि जानवर बड़ी पीड़ा में मर रहा होता है। और फिर तुम खाते हो उस मांस को—उस मांस में वे सब जहर मौजूद हैं जो जानवर ने छोड़े हैं। सारी बात जहरीली है। फिर वे सारे जहर तुम्हारे शरीर में चले आते हैं।
और वह मांस जिसे तुम खा रहे हो, किसी जानवर के शरीर का मांस है। वहां उसका कोई सुनिश्चित उद्देश्य था। एक विशिष्ट ढंग की चेतना थी उस जानवर के शरीर में। तुम जानवर की चेतना की तुलना में ज्यादा ऊंचे तल पर हो, और जब तुम जानवर का मांस खाते हो तो तुम्हारा शरीर जानवर के निम्न तल पर आ जाता है। तब तुम्हारी चेतना और तुम्हारे शरीर के बीच एक दूरी पैदा हो जाती है, एक तनाव पैदा हो जाता है, एक बेचैनी होने लगती है।
तो तुम्हें वही चीजें खानी चाहिए जो स्वाभाविक हैं—तुम्हारे लिए स्वाभाविक हैं—फल, मेवा, सब्जियां, जितना हो सके खाओ ये सब। और मजे की बात यह है कि तुम इन चीजों को अपनी जरूरत से ज्यादा नहीं खा सकते। जो कुछ भी स्वाभाविक होता है वह सदा तुम्हें तृप्ति देता है, क्योंकि वह तुम्हारे शरीर को पोषण देता है, तुम्हें सुखद अनुभूति देता है। तुम तृप्त अनुभव करते हो। यदि कोई बात अस्वाभाविक है तो वह तुम्हें कभी तृप्ति की अनुभूति नहीं देती। आइसक्रीम खाते चले जाओ : तुम कभी तृप्त अनुभव नहीं करते। असल में जितना तुम खाते हो, उतना ही तुम्हें लगता है कि और खाओ। वह भोज्य पदार्थ नहीं है। तुम्हारे मन को धोखा दिया जा रहा है। अब तुम शरीर की आवश्यकता के अनुसार नहीं खा रहे हो; तुम बस स्वाद के लिए खा रहे हो। जीभ निर्णायक हो गई है।
आइसक्रीम खाते चले जाओ : तुम कभी तृप्त अनुभव नहीं करते। असल में जितना तुम खाते हो, उतना ही तुम्हें लगता है कि और खाओ। वह भोज्य पदार्थ नहीं है। तुम्हारे मन को धोखा दिया जा रहा है। अब तुम शरीर की आवश्यकता के अनुसार नहीं खा रहे हो; तुम बस स्वाद के लिए खा रहे हो। जीभ निर्णायक हो गई है। जीभ निर्णायक नहीं होनी चाहिए। वह पेट के बारे में कुछ भी नहीं जानती है। वह शरीर के बारे में कुछ भी नहीं जानती है। जीभ का केवल एक काम है : भोजन का स्वाद लेना। स्वभा#वत:, जीभ को सजग रहना होता है, केवल यह देखना होता है कि कौन सा भोजन शरीर के लिए ठीक है—मेरे शरीर के लिए—और कौन सा भोजन मेरे शरीर के लिए ठीक नहीं है। वह दरवाजे पर बैठा चौकीदार है; वह मालिक नहीं है। और यदि दरवाजे पर बैठा चौकीदार मालिक बन जाए, तो हर चीज गड़बड़ा जाती है।
2 weeks ago | [YT] | 9
View 3 replies
NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel
Thank you God for healthy food
3 weeks ago | [YT] | 109
View 2 replies
NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel
World Vegitarian day 1 October 2026
3 weeks ago (edited) | [YT] | 53
View 0 replies
NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel
*प्रातः वंदन* 🙏🏽
*जीवन का चक्र भी कमाल का है*
*जब नादान थे तो*
*जिंदगी के मजे लेते थे*
*समझदार हुए तो*
*जिंदगी मज़े ले रही है*
*निंदा करने वाला व्यक्ति*
*सज्जन नही बन सकता*
*देखा जाए तो बुद्धि सबके पास है*
*कुटिलता करना या ईमानदारी*
*ये संस्कारों पर निर्भर करता है*
*कुटिलता चार दिन चमकती है*
*और ईमानदारी जीवनभर*
*संसार से कभी आशा मत रखना*
*और ईश्वर से कभी निराश मत होना*
🪷 *सुप्रभात* 🪷
1 month ago | [YT] | 25
View 0 replies
NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel
🙏🌹तप,सेवा,सुमिरन🌹🙏
Part (२७ )
नई भोजन प्रथा से जुड़े सभी साधकों को प्यार भरा नमस्कार
साधक मित्रों, हमने ये तो जाना की आयुर्वेद में हमें समझाया गया है की.............
लंघनम परम औषधम।
यानी की दर्द चाहे कोई भी हो उसका उपाय एक ही है,उपवास। मित्रों हम ये भी अच्छी तरह से जानते ही है की हमारे ऋषिमुनि हज्जारों साल की आयु भुगत ते थे।ओर उसकी वजह भी सिर्फ और सिर्फ यही था,की वे लोग लंबा उपवास करते थे।ओर इसीलिए उपवास को उन्होंने धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान दिया है।ताकि लोग धर्म को जान के, समझ के,धर्म के डर से,या किसी और को देख के,या किसी के समझाने पे भी उपवास कर पाएं।
मित्रों,उपवास और धर्म के बीच वैसे तो कुछ आपसी नाता नहीं रहा। क्यों की भगवान किसको भी भूखा क्यों रखना चाहेंगे? अरे कोई भी मां ,बाप अपने बेटे को कैसे भूखा रख सकते है,या कैसे भूखा देख भी पाते है?
मित्रों, उपवास सिर्फ और सिर्फ हमारे शरीर की सुधि के लिए ही है।यदि हम उपवास करतें है तो हमारे पाचन तंत्र को आराम मिलता है,या शरीर में जमा हुआ जो भोजन है उसका सही पाचन हो पाता है।
मगर साधक मित्रों ,उपवास किसे कहते है? या फिर सही उपवास कैसे किया जाता है? इसका भी हमें शायद सही जानकारी नहीं है,ओर हम उपवास करते है।मित्रों कोई भी धर्म ऐसा नहीं है की जिसमे धर्म को महत्व न दिया हो।मगर सही जानकारी न होने की वजह से सभी धर्मो के कई धर्माचार्य से लेकर,बड़े बड़े संतों और महंतों से लेकर हमारे जैसे सामान्य लोग,सब बीमार है।
तो मित्रों, आइए हम यहां ये जानने की कोशिश करते है की सही उपवास किसे कहते है? या सभी उपवास कैसे किया जाता है?
मगर कल।
धन्यवाद ।
🙏🌹जय तंदुरस्ती🌹🙏
1 month ago | [YT] | 8
View 0 replies
NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel
🙏🌹तप,सेवा,सुमिरन🌹🙏
Part ( २४ )
नई भोजन प्रथा से जुड़े सभी साधकों को प्यार भरा नमस्कार।
साधक मित्रों,हम लगातार ये समझने की कोशिश कर रहे है की,कुदरत हमारी गलतियों होने के बावजूद भी हमें स्वस्थ रखने के लिए कितनी कोशिश कर रही है।मगर न जाने क्यों हमने ऐसी ठान ली है की हम उनको किसी भी बात में सहयोग देने के लिए तैयार ही नहीं होते।
साधक मित्रों,कुदरत हमें स्वस्थ रखने के लिए एक और भी तरीका अपनाती है।कभी कभी हमें वॉमिट हो जाती है,यानी की (उल्टी)होती है।ये भी सफाई का ही एक हिस्सा ही है,वोमोटिंग के जरिए भी हमारे शरीर में से कूड़ा ही तो निकल रहा है न,जिसकी शरीर में कोई जरूरत ही नही होती,शरीर उसे किसी न किसी रास्ते से निकाल ही देता है।
मगर हम 🤮 वॉमिट को भी रोग ही समझते है न।तो उसे भी बंद करनेकी कोशिश करते है,उसे रोकने की कोशिश करते है।
साधक मित्रों,जब भी कुदरत हमारे शरीर में से,कहिंसे भी,किसी भी तरह से सफाई का काम शुरू करती है,तो हमे उसे मदद करनी चाहिए। जैसे की दस्त हुआ है,तो उपरसे डालना बंध कर देना चाहिए।ओर संजीवनी क्रिया (एनिमा)के जरिए मल को निकाल ने में मदद रूप होना चाहिए,तो जल्द ही सफाई हो जायेगी।
मगर हम मददरूप न होके दवाइयों के सहारे चले जाते है,ओर उसे रोकने की कोशिश करते है ओर बीमार ही रहते है।
मित्रों, कुदरत हमे स्वस्थ रखने का एक और भी प्रयास करती है,देखे कैसे।
मगर कल ।
धन्यवाद ।
🙏🌹जय तंदुरस्ती🌹🙏
1 month ago | [YT] | 4
View 0 replies
NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel
🙏🌹तप ,सेवा,सुमिरन🌹🙏
Part। ( २३ )
नई भोजन प्रथा से जुड़े सभी साधकों को प्यार भरा नमस्कार।
साधक मित्रों, हम लगातार ये समझने की कोशिश कर रहे है की,कुदरत हमें स्वस्थ रखने के लिए कितनी कोशिश कर रही है,ओर उसके सामने हम उन्हे क्या समझ रहे है ओर क्या कर रहे है?
मित्रों,हमारे शरीर में चिपके हुए मल को कुदरत पसीने के ज़रिए भी निकल ने की कोशिश करती है।जिसके शरीर में ज्यादा मल चिपका हुआ होता है,उसे ज्यादा पसीना आता है,ओर ये पसीना भी एक तरह का कूड़ा ही है न।देखो कई लोगों के पसीने से भी इतनी बदबू आती है की हम उनके पास बैठ भी नही सकते।अरे उनके कपड़े पे भी ऐसे धब्बे पड़ जाते है की साबुन से भी नहीं निकलते,आखिर क्यों? क्यों की वो मल ही है,कूड़ा ही है।
मगर मित्रों हम ज्यादा निकलने वाले पसीने को भी रोग ही समझते है,ओर उसे भी रोकने की कोशिश करते है न ? हमें घर में या ऑफिस में ए. सी. चाहिए,या एयर कूलर चाहिए,या पंखे चाहिए।अरे गाड़ी भी ए सी वाली ही चाहिए।एक मिनिट के लिए भी मानो यदि लाइट क्या चली गई की घर में या ऑफिस में भूचाल आ जाता है,हम चिल्ला उठते है।थोड़ी सी भी गरमी हमसे सही नही जाती। हां जी,हम दूसरों पे तो गरम हो जाते है,मगर हमसे गरमी नही सही जाती।
अरे,अब तो गावों में भी जो लोग अपने फार्म हाउस बनाते है,अपने फार्म पे,तो वहां भी ए सी लगवाते है।अरे भाई क्या है ये? आप खेतों में रहते हो तब तो कुदरत के सहारे जीना सीखो।कुदरती हवा की थोड़ी सी तो मज़ा लो। मगर नही, पड़ोस में ए सी वाली गाड़ी आई ,तो हमे भी चाहिए ही चाहिए,पड़ोस में घर में ए सी लगा नहीं की हमें भी चाहिए ही चाहिए,पड़ोस के फार्म हाउस में ए सी लगा नहीं की हमे भी चाहिए ही चाहिए,चाहे कुछ भी हो।ये पागलपन नहीं है तो क्या है?
मित्रों, हो सके इतना हमे कुदरत के सहारे ही जीने की कोशिश करनी ही चाहिए। मगर नहीं,ओर इसीलिए तो हम बीमार है न।
कहेने का मतलब ये है मित्रों की कुदरत हमे स्वस्थ रखने के लिए जो जो कोशिश करती है उसे हम कामयाब होने ही नही देते।हम पसीने को भी बाहर नहीं निकलने देते ओर इसका भी इलाज करवाते है।
मित्रों, फिर भी कुदरत हमारी मां जो है न,वो फिर भी कोशिश जारी ही रखती है हमें स्वस्थ रखने की,आइए जानते है की कैसे?
मगर कल।
धन्यवाद ।
🙏🌹जय तंदुरस्ती🌹🙏
1 month ago | [YT] | 6
View 0 replies
NEW DIET SYSTEM | NDS Health Center Dr Zarna Patel
🙏🌹तप ,सेवा,सुमिरन🌹🙏
Part। ( २३ )
नई भोजन प्रथा से जुड़े सभी साधकों को प्यार भरा नमस्कार।
साधक मित्रों, हम लगातार ये समझने की कोशिश कर रहे है की,कुदरत हमें स्वस्थ रखने के लिए कितनी कोशिश कर रही है,ओर उसके सामने हम उन्हे क्या समझ रहे है ओर क्या कर रहे है?
मित्रों,हमारे शरीर में चिपके हुए मल को कुदरत पसीने के ज़रिए भी निकल ने की कोशिश करती है।जिसके शरीर में ज्यादा मल चिपका हुआ होता है,उसे ज्यादा पसीना आता है,ओर ये पसीना भी एक तरह का कूड़ा ही है न।देखो कई लोगों के पसीने से भी इतनी बदबू आती है की हम उनके पास बैठ भी नही सकते।अरे उनके कपड़े पे भी ऐसे धब्बे पड़ जाते है की साबुन से भी नहीं निकलते,आखिर क्यों? क्यों की वो मल ही है,कूड़ा ही है।
मगर मित्रों हम ज्यादा निकलने वाले पसीने को भी रोग ही समझते है,ओर उसे भी रोकने की कोशिश करते है न ? हमें घर में या ऑफिस में ए. सी. चाहिए,या एयर कूलर चाहिए,या पंखे चाहिए।अरे गाड़ी भी ए सी वाली ही चाहिए।एक मिनिट के लिए भी मानो यदि लाइट क्या चली गई की घर में या ऑफिस में भूचाल आ जाता है,हम चिल्ला उठते है।थोड़ी सी भी गरमी हमसे सही नही जाती। हां जी,हम दूसरों पे तो गरम हो जाते है,मगर हमसे गरमी नही सही जाती।
अरे,अब तो गावों में भी जो लोग अपने फार्म हाउस बनाते है,अपने फार्म पे,तो वहां भी ए सी लगवाते है।अरे भाई क्या है ये? आप खेतों में रहते हो तब तो कुदरत के सहारे जीना सीखो।कुदरती हवा की थोड़ी सी तो मज़ा लो। मगर नही, पड़ोस में ए सी वाली गाड़ी आई ,तो हमे भी चाहिए ही चाहिए,पड़ोस में घर में ए सी लगा नहीं की हमें भी चाहिए ही चाहिए,पड़ोस के फार्म हाउस में ए सी लगा नहीं की हमे भी चाहिए ही चाहिए,चाहे कुछ भी हो।ये पागलपन नहीं है तो क्या है?
मित्रों, हो सके इतना हमे कुदरत के सहारे ही जीने की कोशिश करनी ही चाहिए। मगर नहीं,ओर इसीलिए तो हम बीमार है न।
कहेने का मतलब ये है मित्रों की कुदरत हमे स्वस्थ रखने के लिए जो जो कोशिश करती है उसे हम कामयाब होने ही नही देते।हम पसीने को भी बाहर नहीं निकलने देते ओर इसका भी इलाज करवाते है।
मित्रों, फिर भी कुदरत हमारी मां जो है न,वो फिर भी कोशिश जारी ही रखती है हमें स्वस्थ रखने की,आइए जानते है की कैसे?
मगर कल।
धन्यवाद ।
🙏🌹जय तंदुरस्ती🌹🙏
1 month ago | [YT] | 5
View 1 reply
Load more