नमस्ते दोस्तों, स्वागत है आपका एक और रहस्यमयी सफर पर। मैं हूं 👉 सुधीर कुमार वानखेड़े ........ और आज हम बात करेंगे भारत की एक ऐसी मूर्ति के बारे में, जिसके बारे में इतिहास की किताबों में तो छोड़िए, विकिपीडिया पर भी कुछ खास नहीं लिखा गया है। आज तक किसी ने भी इस मूर्ति का असली मतलब नहीं बताया है।
यह मूर्ति कहां स्थित है?
यह विचित्र और डरावनी मूर्ति कर्नाटक के हसन जिले के अरसीकेरे कस्बे में स्थित ईश्वर मंदिर के प्रवेश द्वार पर खड़ी है। यह मंदिर होयसल राजवंश के काल का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो लगभग 800 साल पुराना है।
मूर्ति का विवरण और रहस्यमयी अर्थ
पहली नज़र में, यह मूर्ति किसी यमराज या भूत-प्रेत की तरह लग सकती है। इसके बड़े, उभरे हुए नेत्र, लंबी और फटी हुई जीभ, तीखे दांत, और सिकुड़ी हुई हड्डियां देखने वाले के मन में भय पैदा करती हैं। मूर्ति के एक हाथ में खंजर और दूसरे हाथ में एक कटोरी है।
लेकिन अगर हम गहराई से देखें, तो यह मूर्ति हिंदू दर्शन के एक बहुत ही गहरे और दार्शनिक पहलू को दर्शाती है। यह मूर्ति वास्तव में मनुष्य के अहंकार और मृत्यु की सच्चाई का प्रतिनिधित्व करती है।
अहंकार की मृत्यु: मूर्ति के हाथ में खंजर अहंकार को मारने का प्रतीक है। कटोरी अहंकार के खून को इकट्ठा करने के लिए है, ताकि यह फिर से जीवित न हो सके।
सच्चाई की जीत: मूर्ति का कंकाल जैसा शरीर दर्शाता है कि मृत्यु अनिवार्य है और हर मनुष्य को एक दिन मिट जाना है। लेकिन सच्चाई और धर्म हमेशा बने रहते हैं।
हिंदू धर्म की महानता: यह मूर्ति हिंदू धर्म की समृद्ध और विविध परंपराओं का प्रमाण है। यह केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं है, बल्कि एक कलात्मक और दार्शनिक उत्कृष्ट कृति है ।
👉 ईश्वर मंदिर की यह रहस्यमयी मूर्ति हमें याद दिलाती है कि हमारे प्राचीन पूर्वजों के पास जीवन और मृत्यु के बारे में कितना गहरा ज्ञान था। यह हमें अहंकार को त्यागने और सच्चाई के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
अगर आपको यह जानकारी पसंद आई हो, तो कृपया हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें और बैल आइकन को दबाएं। हमारे चैनल का नाम है " Skumar vlogs"। हम आपके लिए ऐसे ही रोचक और ज्ञानवर्धक वीडियो लाते रहेंगे। धन्यवाद!
यह प्रतिमा भगवान शिव के नटराज (नृत्य रूप) को दर्शाती है।
स्वरूप और मुद्रा: इसमें भगवान शिव को ब्रह्मांडीय नृत्य (तांडव) की भावभंगिमा में उकेरा गया है। उनका एक पैर पृथ्वी पर संतुलित है, जबकि दूसरा पैर नृत्य की लय में ऊपर उठा हुआ है।
अनेक भुजाएँ और आयुध: भगवान शिव बहुभुज (अनेक हाथों वाले) रूप में दिखाई दे रहे हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार के शस्त्र और नृत्य से जुड़ी विशेष हस्तमुद्राएं हैं।
शिल्पकला: सिर पर ऊंचा जटामुकुट और शरीर पर सुंदर आभूषण मध्यकालीन हेमाडपंथी/चालुक्य वास्तुकला की बारीकी को दर्शाते हैं।
संगीतमय वातावरण: पैरों के पास नीचे दोनों ओर वाद्य यंत्र (जैसे मृदंग/ढोल) बजाते हुए शिवगण और उनका वाहन नंदी दिखाई दे रहे हैं, जो इस नृत्य में संगीत का ताल दे रहे हैं।
नेपाल की राजधानी काठमांडू में बागमती नदी के तट पर स्थित पशुपतिनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित दुनिया का सबसे पवित्र और प्राचीन हिंदू मंदिर है, जिसका इतिहास और अद्भुत वास्तुकला इसे खास बनाते हैं।
पौराणिक कथा और महत्व 👉 'पशुपति' का अर्थ सभी जीवों और प्राणियों का स्वामी होता है। मान्यता है कि शिवजी यहां बागमती के जंगलों में हिरण का रूप धारण कर रहे थे। : इस ज्योतिर्लिंग को केदारनाथ मंदिर का ही एक भाग माना जाता है।
इतिहास और निर्माण 👉 इस पावन स्थल का इतिहास चौथी शताब्दी (400 ईस्वी) या उससे भी पुराना माना जाता है। मूल मंदिर के नष्ट होने के बाद वर्तमान पगोडा शैली का भव्य मंदिर राजा भूपलेंद्र मल्ला द्वारा 1697 ईस्वी में बनवाया गया था। इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल किया गया है।
मुख्य विशेषताएं 👉 यहाँ गर्भगृह में स्थापित मुख्य शिवलिंग के चार दिशाओं में मुख और एक मुख ऊपर की ओर है। 18वीं सदी से चली आ रही परंपरा के अनुसार यहां मुख्य पुजारी हमेशा दक्षिण भारत (केरल/कर्नाटक) के ब्राह्मण ही होते हैं।
पत्थर पर उकेरी गई एक कालजयी उत्कृष्ट कृति, जो माँ गंगा की दिव्य कृपा, शालीनता और प्रवाहमान ऊर्जा को दर्शाती है। इसका हर आभूषण, भाव और बारीक विवरण भारत की समृद्ध कलात्मक विरासत की कहानी बयां करता है। 🕉️🤍
तुमकुरु जिले के तिप्तुर तालुक में स्थित अरालगुप्पे अपने होयसल चेन्नाकेशव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन गाँव के तालाब के पास पुराना पंचलिंग परिसर स्थित है, जिसमें कल्लेश्वर इसका प्रमुख मंदिर है।
मोटे तौर पर नौवीं शताब्दी ईस्वी के माने जाने वाले इस मंदिर में गंगवाड़ी की व्यापक राजनीतिक दुनिया के भीतर एक मजबूत नोलंब स्थापत्य और मूर्तिकला की पहचान झलकती है। इस संदर्भ में मांड्या से प्राप्त 895-96 ईस्वी का तयालुर शिलालेख महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह गंगा (Ganga) राजनीतिक क्षेत्र की गहराई में नोलंब की उपस्थिति को दर्शाता है।
मैसूर पुरातत्व विभाग ने 1935 में कल्लेश्वर को पंचलिंग समूह के सबसे बड़े मंदिर के रूप में दर्ज किया था।
इसका बाहरी हिस्सा साधारण है। इसकी सबसे बेहतरीन कलाकारी इसके अंदर मौजूद है।
नवरंग के प्रवेश द्वार पर यक्ष, शैव द्वारपाल, लता और रस्सी के आभूषण, गजलक्ष्मी और कीर्तिमुख उकेरे गए हैं। इसके स्तंभों में घंटी के आकार और सोलह-नालियों (fluted) वाले रूप शामिल हैं, जिनकी समानताएं तलकाड़ के मंदिरों में भी देखी जा सकती हैं।
मध्य छत इस मंदिर की सबसे बेहतरीन विशेषता है। इसके केंद्र में भगवान शिव नृत्य कर रहे हैं, जो आठ दिक्पालों और उनकी पत्नियों, सेवकों और वाहनों से घिरे हुए हैं। इंद्र ऐरावत पर, वायु हिरण पर और वरुण मकर के साथ दिखाई देते हैं। संगीतकार शिव के साथ संगत कर रहे हैं, जिनमें से एक तीन-ढोल (triple drum) बजा रहा है, जिसे श्री आई. के. शर्मा ने 'त्रिघट' के रूप में पहचाना है।
दक्षिणी मंदिर में उमामहेश्वर की एक सुंदर मूर्ति संरक्षित है, जिसमें शिव और उमा एक साथ बैठे हैं, ऊपर गंधर्व हैं और नीचे नंदी हैं।
अरालगुप्पे के तीन शिलालेख 'एपिग्राफिया कार्नटिका' (Epigraphia Carnatica), खंड XII, तिप्तुर संख्या 55-57 में प्रकाशित हुए हैं।
संख्या 55: मल्लुगा का उल्लेख करता है, जिसने हमलावरों द्वारा छीने गए मवेशियों को वापस छुड़ाया था और पश्चिमी गंगा काल के दौरान इस मुठभेड़ में उसकी मृत्यु हो गई थी।
संख्या 56: बेलगेरे (Belgere) को लेकर एक स्थानीय संघर्ष को दर्ज करता है।
संख्या 57: 1091 ईस्वी का यह शिलालेख, एक पत्थर के तालाब और उसके जलद्वार (sluice) के निर्माण के साथ-साथ डोरा-गौड़ा और जक्कामार द्वारा महादेव को दिए गए अनुदानों का उल्लेख करता है। यह अभिलेख सेनाबोवा मुद्दया द्वारा लिखा गया था।
यह मंदिर, तालाब, वीर प्रस्तर (hero stones) और शिलालेख सामूहिक रूप से पूजा, ग्राम प्रशासन, जल प्रबंधन और स्थानीय स्मृतियों के इतिहास को संरक्षित करते हैं।
कल्लेश्वर और चेन्नाकेशव दोनों के दर्शन करें। साथ मिलकर, वे नोलंब-गंगा युग से होयसल युग तक कर्नाटक की मंदिर वास्तुकला की उल्लेखनीय निरंतरता को दर्शाते हहैं
मैसूर पुरातत्व विभाग, 1935 की वार्षिक रिपोर्ट, पृष्ठ 11-12.
बी. लुईस राइस, एपिग्राफिया कार्नटिका, खंड XII, तिप्तुर संख्या 55-57.
एपिग्राफिया इंडिका, खंड VI.
आई. के. शर्मा, टेम्प्ल्स ऑफ़ द गंगास ऑफ़ कर्नाटका (Temples of the Gangas of Karnataka).
अलौकिक: जानिए, सबसे बड़े शिवलिंग और रात भर में बने इस अनोखे मंदिर की कहानी
इस मंदिर को एक ही रात में बनाया जाना था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सुबह होते ही इस मंदिर का निर्माण कार्य रोक दिया गया। उस समय छत के बनाए जाने का कार्य चल रहा था, लेकिन सूर्योदय होने के साथ ही मंदिर का निर्माण कार्य रोक दिया गया, तब से यह मंदिर अधूरा ही है।
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किमी दूर स्थित भोजपुर से लगती हुई पहाड़ी पर एक विशाल, अधूरा शिव मंदिर हैं। यह भोजपुर शिव मंदिर या भोजेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हैं। इतिहासकार कहते हैं कि भोजपुर तथा इस शिव मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज (1010 ई - 1055 ई ) द्वारा किया गया था।
रायसेन जिले की गौहर गंज तहसील के ओबेदुल्ला विकास खंड में स्थित इस शिव मंदिर को 11 वीं सदी में परमार वंश के राजा भोज प्रथम ने बनवाया था। कंक्रीट के जंगलों को पीछे छोड़ प्रकृति की हरी भरी गोद में, बेतवा नदी के किनारे बना उच्च कोटि की वास्तुकला का यह नमूना राजा भोज के वास्तुविदों के सहयोग से तैयार हुआ था। इस मंदिर की विशेषता इसका विशाल शिवलिंग हैं जो कि विश्व का एक ही पत्थर से निर्मित सबसे बड़ा शिवलिंग हैं। सम्पूर्ण शिवलिंग कि लम्बाई 5.5 मीटर (18 फीट ), व्यास 2.3 मीटर (7.5 फीट ), तथा केवल शिवलिंग कि लम्बाई 3.85 मीटर (12 फीट) है।
अधूरा है भोजपुर का ये शिव मंदिर भोजेश्वर मंदिर का अधूरा निर्माण हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर के अधूरे होने के पीछे एक बड़ा कारण है। किस्से कहानियों कहते हैं। इस मंदिर को किसी वजह से एक ही रात में बनाया जाना था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सुबह होते ही इस मंदिर का निर्माण कार्य रोक दिया गया। उस समय छत के बनाए जाने का कार्य चल रहा था, लेकिन सूर्योदय होने के साथ ही मंदिर का निर्माण कार्य रोक दिया गया, तब से ये मंदिर अधूरा ही है। हालांकि पुरातत्व विभाग ऐसी किसी भी घटना की पुष्टि नहीं करता है।
इस्लाम के आगमन के पहले हुए था निर्माण.. इतिहासकारों एवं पुरातत्विदों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण भारत में इस्लाम के आगमन के पहले हुआ था अतः इस मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी अधूरी गुम्बदाकार छत भारत में ही गुम्बद निर्माण के प्रचलन को प्रमाणित करती है। भले ही उनके निर्माण की तकनीक भिन्न हो। कुछ विद्धान इसे भारत में सबसे पहले गुम्बदीय छत वाली इमारत भी मानते हैं। इस मंदिर का दरवाजा भी किसी हिंदू इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है।
इस मंदिर की विशेषता इसके 40 फीट ऊंचाई वाले इसके चार स्तम्भ भी हैं। गर्भगृह की अधूरी बनी छत इन्हीं चार स्तंभों पर टिकी है। इसके अतिरिक्त भूविन्यास, सतम्भ, शिखर, कलश और चट्टानों की सतह पर आशुलेख की तरह उत्कीर्ण नहीं किए हुए हैं। भोजेश्वर मंदिर के विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की योजना थी। ऐसा मंदिर के निकट के पत्थरों पर बने मंदिर- योजना से संबद्ध नक्शों से पता चलता है।!!! महादेव 🙏
बेंगलुरु के सबसे पुराने और आज भी मौजूद हिंदू मंदिरों में से एक, हलसूरू सोमेश्वर मंदिर के राजसी पूर्वी गोपुरम का एक दुर्लभ दृश्य। भगवान शिव को समर्पित, यह मंदिर अपनी उत्कृष्ट नक्काशीदार द्रविड़ वास्तुकला, गगनचुंबी प्रवेश द्वार (गोपुरम) और प्रवेश द्वार के ठीक सामने शान से खड़े खूबसूरती से उकेरे गए ध्वज स्तंभ के लिए प्रसिद्ध है।
इस फोटो का इतिहास (Gajasamhara Murti का इतिहास) यह शानदार पत्थर की नक्काशी भगवान शिव के एक अत्यंत शक्तिशाली और उग्र रूप को दर्शाती है, जिसे 'गजासंहार मूर्ति' (Gajasamhara Murti) कहा जाता है।
पौराणिक कथा: यह मूर्ति तमिलनाडु के तंजावुर जिले में स्थित प्राचीन वाझुवूर वीरट्टेश्वर मंदिर (Vazhuvur Veerateswarar Temple) की है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, कुछ असुरों ने भगवान शिव को मारने के लिए एक विशाल और शक्तिशाली हाथी के रूप में एक असुर (गजासुर) को भेजा। भगवान शिव ने उस हाथी रूपी असुर से भीषण युद्ध किया और अंततः उसका वध कर दिया। वध करने के बाद, उन्होंने हाथी की खाल को अपने शरीर के चारों ओर एक लबादे या 'अंबर' के रूप में लपेट लिया। मूर्ति की विशेषताएं:
इस मूर्ति में भगवान शिव को गजासुर के कटे हुए सिर पर खड़े होकर तांडव (विनाश का दिव्य नृत्य) करते हुए दिखाया गया है। उनके कई हाथ हैं, जो उनकी असीमित शक्ति का प्रतीक हैं। सबसे खास बात यह है कि उनके हाथों में हाथी की खाल को एक चादर की तरह पकड़े हुए दिखाया गया है, जो उनके पीछे एक प्रभामंडल (halo) जैसा दिखता है।
यह रूप सामान्य नटराज प्रतिमा से बिल्कुल अलग और अधिक उग्र है। यह बुराई पर अच्छाई की पूर्ण विजय का प्रतीक है। फेसबुक के लिए कैप्शन विकल्प आप नीचे दिए गए विकल्पों में से कोई भी चुन सकते हैं:
विकल्प 1 (भावनात्मक और भक्तिपूर्ण): "बुराई पर अच्छाई की प्रचंड विजय का दिव्य प्रमाण! 🔱🚩 वाझुवूर वीरट्टेश्वर मंदिर में स्थित भगवान शिव की यह अद्भुत 'गजासंहार मूर्ति' उनके उग्र तांडव रूप को दर्शाती है, जब उन्होंने गजासुर का वध कर उसकी खाल धारण की थी। यह सामान्य नटराज प्रतिमा से बिल्कुल अलग है। महादेव के इस शक्तिशाली रूप को नमन! 🙏
Skumar vlogs
नमस्ते दोस्तों, स्वागत है आपका एक और रहस्यमयी सफर पर। मैं हूं 👉 सुधीर कुमार वानखेड़े ........
और आज हम बात करेंगे भारत की एक ऐसी मूर्ति के बारे में, जिसके बारे में इतिहास की किताबों में तो छोड़िए, विकिपीडिया पर भी कुछ खास नहीं लिखा गया है। आज तक किसी ने भी इस मूर्ति का असली मतलब नहीं बताया है।
यह मूर्ति कहां स्थित है?
यह विचित्र और डरावनी मूर्ति कर्नाटक के हसन जिले के अरसीकेरे कस्बे में स्थित ईश्वर मंदिर के प्रवेश द्वार पर खड़ी है। यह मंदिर होयसल राजवंश के काल का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो लगभग 800 साल पुराना है।
मूर्ति का विवरण और रहस्यमयी अर्थ
पहली नज़र में, यह मूर्ति किसी यमराज या भूत-प्रेत की तरह लग सकती है। इसके बड़े, उभरे हुए नेत्र, लंबी और फटी हुई जीभ, तीखे दांत, और सिकुड़ी हुई हड्डियां देखने वाले के मन में भय पैदा करती हैं। मूर्ति के एक हाथ में खंजर और दूसरे हाथ में एक कटोरी है।
लेकिन अगर हम गहराई से देखें, तो यह मूर्ति हिंदू दर्शन के एक बहुत ही गहरे और दार्शनिक पहलू को दर्शाती है। यह मूर्ति वास्तव में मनुष्य के अहंकार और मृत्यु की सच्चाई का प्रतिनिधित्व करती है।
अहंकार की मृत्यु: मूर्ति के हाथ में खंजर अहंकार को मारने का प्रतीक है। कटोरी अहंकार के खून को इकट्ठा करने के लिए है, ताकि यह फिर से जीवित न हो सके।
सच्चाई की जीत: मूर्ति का कंकाल जैसा शरीर दर्शाता है कि मृत्यु अनिवार्य है और हर मनुष्य को एक दिन मिट जाना है। लेकिन सच्चाई और धर्म हमेशा बने रहते हैं।
हिंदू धर्म की महानता: यह मूर्ति हिंदू धर्म की समृद्ध और विविध परंपराओं का प्रमाण है। यह केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं है, बल्कि एक कलात्मक और दार्शनिक उत्कृष्ट कृति है ।
👉 ईश्वर मंदिर की यह रहस्यमयी मूर्ति हमें याद दिलाती है कि हमारे प्राचीन पूर्वजों के पास जीवन और मृत्यु के बारे में कितना गहरा ज्ञान था। यह हमें अहंकार को त्यागने और सच्चाई के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
अगर आपको यह जानकारी पसंद आई हो, तो कृपया हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें और बैल आइकन को दबाएं। हमारे चैनल का नाम है " Skumar vlogs"। हम आपके लिए ऐसे ही रोचक और ज्ञानवर्धक वीडियो लाते रहेंगे। धन्यवाद!
6 days ago (edited) | [YT] | 3
View 0 replies
Skumar vlogs
यह प्रतिमा भगवान शिव के नटराज (नृत्य रूप) को दर्शाती है।
स्वरूप और मुद्रा: इसमें भगवान शिव को ब्रह्मांडीय नृत्य (तांडव) की भावभंगिमा में उकेरा गया है। उनका एक पैर पृथ्वी पर संतुलित है, जबकि दूसरा पैर नृत्य की लय में ऊपर उठा हुआ है।
अनेक भुजाएँ और आयुध: भगवान शिव बहुभुज (अनेक हाथों वाले) रूप में दिखाई दे रहे हैं, जिनमें विभिन्न प्रकार के शस्त्र और नृत्य से जुड़ी विशेष हस्तमुद्राएं हैं।
शिल्पकला: सिर पर ऊंचा जटामुकुट और शरीर पर सुंदर आभूषण मध्यकालीन हेमाडपंथी/चालुक्य वास्तुकला की बारीकी को दर्शाते हैं।
संगीतमय वातावरण: पैरों के पास नीचे दोनों ओर वाद्य यंत्र (जैसे मृदंग/ढोल) बजाते हुए शिवगण और उनका वाहन नंदी दिखाई दे रहे हैं, जो इस नृत्य में संगीत का ताल दे रहे हैं।
1 week ago | [YT] | 0
View 0 replies
Skumar vlogs
#Harghad+muler fort view
#maharashtra
#traking
#viralpos
1 month ago | [YT] | 9
View 0 replies
Skumar vlogs
नेपाल की राजधानी काठमांडू में बागमती नदी के तट पर स्थित पशुपतिनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित दुनिया का सबसे पवित्र और प्राचीन हिंदू मंदिर है, जिसका इतिहास और अद्भुत वास्तुकला इसे खास बनाते हैं।
पौराणिक कथा और महत्व
👉 'पशुपति' का अर्थ सभी जीवों और प्राणियों का स्वामी होता है।
मान्यता है कि शिवजी यहां बागमती के जंगलों में हिरण का रूप धारण कर रहे थे। :
इस ज्योतिर्लिंग को केदारनाथ मंदिर का ही एक भाग माना जाता है।
इतिहास और निर्माण
👉 इस पावन स्थल का इतिहास चौथी शताब्दी (400 ईस्वी) या उससे भी पुराना माना जाता है।
मूल मंदिर के नष्ट होने के बाद वर्तमान पगोडा शैली का भव्य मंदिर राजा भूपलेंद्र मल्ला द्वारा 1697 ईस्वी में बनवाया गया था।
इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल किया गया है।
मुख्य विशेषताएं
👉 यहाँ गर्भगृह में स्थापित मुख्य शिवलिंग के चार दिशाओं में मुख और एक मुख ऊपर की ओर है।
18वीं सदी से चली आ रही परंपरा के अनुसार यहां मुख्य पुजारी हमेशा दक्षिण भारत (केरल/कर्नाटक) के ब्राह्मण ही होते हैं।
Subscribe 👉 Skumar vlogs
2 months ago | [YT] | 6
View 0 replies
Skumar vlogs
नदी की देवी — गंगा की नक्काशीदार मूर्ति 🌊✨
पत्थर पर उकेरी गई एक कालजयी उत्कृष्ट कृति, जो माँ गंगा की दिव्य कृपा, शालीनता और प्रवाहमान ऊर्जा को दर्शाती है। इसका हर आभूषण, भाव और बारीक विवरण भारत की समृद्ध कलात्मक विरासत की कहानी बयां करता है। 🕉️🤍
.
.ऊंचाई 55 इंच
.
.चौड़ाई 18 इंच
.
.लंबाई 39 इंच
.
Subscribe 👉 Skumar History
2 months ago | [YT] | 19
View 0 replies
Skumar vlogs
"वाकाटक कालीन शिऊर : वैष्णव समुदाय की गुफाओं का रहस्यमय संग्रह" || A Journey Into Ancient Mysteries ||
Exploring The Enchanting Depth Of Shiur Vaishnav Caves : A Journey Into Ancient Mysteries || :
Location : This caves is located at.SHIUR ,tq.HADGAON{ near 25 to 30 Km }, dist.NANDED { near 75 km } .
The name of this cave is MATA VAISHNAVI DEVI LENI _TRILENI_SHIURLENI .
Thanks for watching my video freands & keep your support to me .......................
2 months ago | [YT] | 14
View 0 replies
Skumar vlogs
विरासत का अन्वेषण करें
अरालगुप्पे कल्लेश्वर मंदिर
गंगवाड़ी के हृदय में एक नोलंब उत्कृष्ट कृति
तुमकुरु जिले के तिप्तुर तालुक में स्थित अरालगुप्पे अपने होयसल चेन्नाकेशव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन गाँव के तालाब के पास पुराना पंचलिंग परिसर स्थित है, जिसमें कल्लेश्वर इसका प्रमुख मंदिर है।
मोटे तौर पर नौवीं शताब्दी ईस्वी के माने जाने वाले इस मंदिर में गंगवाड़ी की व्यापक राजनीतिक दुनिया के भीतर एक मजबूत नोलंब स्थापत्य और मूर्तिकला की पहचान झलकती है। इस संदर्भ में मांड्या से प्राप्त 895-96 ईस्वी का तयालुर शिलालेख महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह गंगा (Ganga) राजनीतिक क्षेत्र की गहराई में नोलंब की उपस्थिति को दर्शाता है।
मैसूर पुरातत्व विभाग ने 1935 में कल्लेश्वर को पंचलिंग समूह के सबसे बड़े मंदिर के रूप में दर्ज किया था।
इसका बाहरी हिस्सा साधारण है। इसकी सबसे बेहतरीन कलाकारी इसके अंदर मौजूद है।
नवरंग के प्रवेश द्वार पर यक्ष, शैव द्वारपाल, लता और रस्सी के आभूषण, गजलक्ष्मी और कीर्तिमुख उकेरे गए हैं। इसके स्तंभों में घंटी के आकार और सोलह-नालियों (fluted) वाले रूप शामिल हैं, जिनकी समानताएं तलकाड़ के मंदिरों में भी देखी जा सकती हैं।
मध्य छत इस मंदिर की सबसे बेहतरीन विशेषता है। इसके केंद्र में भगवान शिव नृत्य कर रहे हैं, जो आठ दिक्पालों और उनकी पत्नियों, सेवकों और वाहनों से घिरे हुए हैं। इंद्र ऐरावत पर, वायु हिरण पर और वरुण मकर के साथ दिखाई देते हैं। संगीतकार शिव के साथ संगत कर रहे हैं, जिनमें से एक तीन-ढोल (triple drum) बजा रहा है, जिसे श्री आई. के. शर्मा ने 'त्रिघट' के रूप में पहचाना है।
दक्षिणी मंदिर में उमामहेश्वर की एक सुंदर मूर्ति संरक्षित है, जिसमें शिव और उमा एक साथ बैठे हैं, ऊपर गंधर्व हैं और नीचे नंदी हैं।
अरालगुप्पे के तीन शिलालेख 'एपिग्राफिया कार्नटिका' (Epigraphia Carnatica), खंड XII, तिप्तुर संख्या 55-57 में प्रकाशित हुए हैं।
संख्या 55: मल्लुगा का उल्लेख करता है, जिसने हमलावरों द्वारा छीने गए मवेशियों को वापस छुड़ाया था और पश्चिमी गंगा काल के दौरान इस मुठभेड़ में उसकी मृत्यु हो गई थी।
संख्या 56: बेलगेरे (Belgere) को लेकर एक स्थानीय संघर्ष को दर्ज करता है।
संख्या 57: 1091 ईस्वी का यह शिलालेख, एक पत्थर के तालाब और उसके जलद्वार (sluice) के निर्माण के साथ-साथ डोरा-गौड़ा और जक्कामार द्वारा महादेव को दिए गए अनुदानों का उल्लेख करता है। यह अभिलेख सेनाबोवा मुद्दया द्वारा लिखा गया था।
यह मंदिर, तालाब, वीर प्रस्तर (hero stones) और शिलालेख सामूहिक रूप से पूजा, ग्राम प्रशासन, जल प्रबंधन और स्थानीय स्मृतियों के इतिहास को संरक्षित करते हैं।
कल्लेश्वर और चेन्नाकेशव दोनों के दर्शन करें। साथ मिलकर, वे नोलंब-गंगा युग से होयसल युग तक कर्नाटक की मंदिर वास्तुकला की उल्लेखनीय निरंतरता को दर्शाते हहैं
मैसूर पुरातत्व विभाग, 1935 की वार्षिक रिपोर्ट, पृष्ठ 11-12.
बी. लुईस राइस, एपिग्राफिया कार्नटिका, खंड XII, तिप्तुर संख्या 55-57.
एपिग्राफिया इंडिका, खंड VI.
आई. के. शर्मा, टेम्प्ल्स ऑफ़ द गंगास ऑफ़ कर्नाटका (Temples of the Gangas of Karnataka).
2 months ago | [YT] | 17
View 0 replies
Skumar vlogs
अलौकिक: जानिए, सबसे बड़े शिवलिंग और रात भर में बने इस अनोखे मंदिर की कहानी
इस मंदिर को एक ही रात में बनाया जाना था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सुबह होते ही इस मंदिर का निर्माण कार्य रोक दिया गया। उस समय छत के बनाए जाने का कार्य चल रहा था, लेकिन सूर्योदय होने के साथ ही मंदिर का निर्माण कार्य रोक दिया गया, तब से यह मंदिर अधूरा ही है।
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किमी दूर स्थित भोजपुर से लगती हुई पहाड़ी पर एक विशाल, अधूरा शिव मंदिर हैं। यह भोजपुर शिव मंदिर या भोजेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हैं। इतिहासकार कहते हैं कि भोजपुर तथा इस शिव मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज (1010 ई - 1055 ई ) द्वारा किया गया था।
रायसेन जिले की गौहर गंज तहसील के ओबेदुल्ला विकास खंड में स्थित इस शिव मंदिर को 11 वीं सदी में परमार वंश के राजा भोज प्रथम ने बनवाया था। कंक्रीट के जंगलों को पीछे छोड़ प्रकृति की हरी भरी गोद में, बेतवा नदी के किनारे बना उच्च कोटि की वास्तुकला का यह नमूना राजा भोज के वास्तुविदों के सहयोग से तैयार हुआ था। इस मंदिर की विशेषता इसका विशाल शिवलिंग हैं जो कि विश्व का एक ही पत्थर से निर्मित सबसे बड़ा शिवलिंग हैं। सम्पूर्ण शिवलिंग कि लम्बाई 5.5 मीटर (18 फीट ), व्यास 2.3 मीटर (7.5 फीट ), तथा केवल शिवलिंग कि लम्बाई 3.85 मीटर (12 फीट) है।
अधूरा है भोजपुर का ये शिव मंदिर
भोजेश्वर मंदिर का अधूरा निर्माण हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर के अधूरे होने के पीछे एक बड़ा कारण है। किस्से कहानियों कहते हैं। इस मंदिर को किसी वजह से एक ही रात में बनाया जाना था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सुबह होते ही इस मंदिर का निर्माण कार्य रोक दिया गया। उस समय छत के बनाए जाने का कार्य चल रहा था, लेकिन सूर्योदय होने के साथ ही मंदिर का निर्माण कार्य रोक दिया गया, तब से ये मंदिर अधूरा ही है। हालांकि पुरातत्व विभाग ऐसी किसी भी घटना की पुष्टि नहीं करता है।
इस्लाम के आगमन के पहले हुए था निर्माण..
इतिहासकारों एवं पुरातत्विदों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण भारत में इस्लाम के आगमन के पहले हुआ था अतः इस मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी अधूरी गुम्बदाकार छत भारत में ही गुम्बद निर्माण के प्रचलन को प्रमाणित करती है। भले ही उनके निर्माण की तकनीक भिन्न हो। कुछ विद्धान इसे भारत में सबसे पहले गुम्बदीय छत वाली इमारत भी मानते हैं। इस मंदिर का दरवाजा भी किसी हिंदू इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है।
इस मंदिर की विशेषता इसके 40 फीट ऊंचाई वाले इसके चार स्तम्भ भी हैं। गर्भगृह की अधूरी बनी छत इन्हीं चार स्तंभों पर टिकी है। इसके अतिरिक्त भूविन्यास, सतम्भ, शिखर, कलश और चट्टानों की सतह पर आशुलेख की तरह उत्कीर्ण नहीं किए हुए हैं। भोजेश्वर मंदिर के विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की योजना थी। ऐसा मंदिर के निकट के पत्थरों पर बने मंदिर- योजना से संबद्ध नक्शों से पता चलता है।!!! महादेव 🙏
Subscribe 👉 Skumar History
2 months ago | [YT] | 15
View 0 replies
Skumar vlogs
हलसूरू सोमेश्वर मंदिर, बैंगलोर, लगभग 1890 का दशक
बेंगलुरु के सबसे पुराने और आज भी मौजूद हिंदू मंदिरों में से एक, हलसूरू सोमेश्वर मंदिर के राजसी पूर्वी गोपुरम का एक दुर्लभ दृश्य। भगवान शिव को समर्पित, यह मंदिर अपनी उत्कृष्ट नक्काशीदार द्रविड़ वास्तुकला, गगनचुंबी प्रवेश द्वार (गोपुरम) और प्रवेश द्वार के ठीक सामने शान से खड़े खूबसूरती से उकेरे गए ध्वज स्तंभ के लिए प्रसिद्ध है।
Subscribe 👉 Skumar history
2 months ago | [YT] | 8
View 0 replies
Skumar vlogs
इस फोटो का इतिहास (Gajasamhara Murti का इतिहास)
यह शानदार पत्थर की नक्काशी भगवान शिव के एक अत्यंत शक्तिशाली और उग्र रूप को दर्शाती है, जिसे 'गजासंहार मूर्ति' (Gajasamhara Murti) कहा जाता है।
पौराणिक कथा:
यह मूर्ति तमिलनाडु के तंजावुर जिले में स्थित प्राचीन वाझुवूर वीरट्टेश्वर मंदिर (Vazhuvur Veerateswarar Temple) की है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, कुछ असुरों ने भगवान शिव को मारने के लिए एक विशाल और शक्तिशाली हाथी के रूप में एक असुर (गजासुर) को भेजा।
भगवान शिव ने उस हाथी रूपी असुर से भीषण युद्ध किया और अंततः उसका वध कर दिया। वध करने के बाद, उन्होंने हाथी की खाल को अपने शरीर के चारों ओर एक लबादे या 'अंबर' के रूप में लपेट लिया।
मूर्ति की विशेषताएं:
इस मूर्ति में भगवान शिव को गजासुर के कटे हुए सिर पर खड़े होकर तांडव (विनाश का दिव्य नृत्य) करते हुए दिखाया गया है।
उनके कई हाथ हैं, जो उनकी असीमित शक्ति का प्रतीक हैं।
सबसे खास बात यह है कि उनके हाथों में हाथी की खाल को एक चादर की तरह पकड़े हुए दिखाया गया है, जो उनके पीछे एक प्रभामंडल (halo) जैसा दिखता है।
यह रूप सामान्य नटराज प्रतिमा से बिल्कुल अलग और अधिक उग्र है। यह बुराई पर अच्छाई की पूर्ण विजय का प्रतीक है।
फेसबुक के लिए कैप्शन विकल्प
आप नीचे दिए गए विकल्पों में से कोई भी चुन सकते हैं:
विकल्प 1 (भावनात्मक और भक्तिपूर्ण):
"बुराई पर अच्छाई की प्रचंड विजय का दिव्य प्रमाण! 🔱🚩
वाझुवूर वीरट्टेश्वर मंदिर में स्थित भगवान शिव की यह अद्भुत 'गजासंहार मूर्ति' उनके उग्र तांडव रूप को दर्शाती है, जब उन्होंने गजासुर का वध कर उसकी खाल धारण की थी। यह सामान्य नटराज प्रतिमा से बिल्कुल अलग है। महादेव के इस शक्तिशाली रूप को नमन! 🙏
Subscribe 👉 Skumar History
#Mahadev #LordShiva #HarHarMahadev #ShivTandav #GajasamharaMahadev #SanatanDharma #HinduTemple #IndianMythology #TemplesOfIndia #AncientArchitecture #VazhuvurViretteswararTemp #TamilNaduTemples #Shivoham #Bholenath #ArtAndCulture #HeritageIndia #ViralPost
2 months ago | [YT] | 9
View 0 replies
Load more