Acharya Bhanu Pratap Shukla

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Acharya Bhanu Pratap Shukla

सभी को सादर जय सियाराम 🙏🙏
🌺🌺आयोजित श्री राम कथा 3 मई से 11 मई ग्राम पैड़ी बरा कौड़िया बाजार के अष्टम दिवस के पावन सत्र में सुविख्यात श्री राम कथा गायक श्री राजन जी महराज के मुखारविंद से भगवान श्री राम जी की पुण्य कथा सुनने का दिव्य सुअवसर प्राप्त हुआ।🌺🌺

5 months ago | [YT] | 3

Acharya Bhanu Pratap Shukla

🚩🚩 श्री हरि 🚩🚩
पद्मनाभ स्वामी केरल (विशेषकर तिरुवनंतपुरम) में स्थित प्रसिद्ध हिंदू मंदिर के बारे में विस्तृत, शास्त्र-आधारित और प्रमाण संबंधी जानकारी दी जा रही है। ध्यान दें कि शास्त्रों में इस मंदिर और देवता का उल्लेख विशेषतः विष्णु पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण आदि ग्रंथों में मिलता है — साथ ही विष्णु-भक्त वैष्णव परंपरा में इसे एक महत्त्वपूर्ण दिव्य धाम माना जाता है। �
🛕 1. श्री पद्मनाथ स्वामी कौन हैं? — धार्मिक और शास्त्रीय आधार
श्री पद्मनाथ स्वामी (Padmanabhaswamy) भगवान विष्णु का एक दिव्य रूप हैं, जिनका स्वरूप अनंतशयन — यानी शेषनाग (अदिशेष) पर विश्राम करते हुए दिखाया जाता है।
Padma = कमल
nabha = नाभि (पेट का मध्य)
swamy = स्वामी (ईश्वर)
इसलिए पद्मनाभस्वामी का अर्थ होता है — “वह स्वामी जिनकी नाभि में कमल है”। �
पौराणिक मान्यता के अनुसार विष्णु की यह विश्राममूर्ति उनके अनंत (शेषनाग) पर है, और इसीलिए तिरुवनंतपुरम का नाम भी “अनंता (भगवान) की भूमि” के रूप में पड़ा। �


। । आचार्य भानु प्रताप शुक्ल।।
श्री धाम अयोध्या जी

8 months ago | [YT] | 4

Acharya Bhanu Pratap Shukla

नवरात्रि हार्दिक शुभकामनाएं

1 year ago | [YT] | 7

Acharya Bhanu Pratap Shukla

सभी को सादर जय सियाराम 🙏🙏
आप सभी को विश्वकर्मा पूजा और भारत देश के आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी जी के जन्मोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं भगवान भोले नाथ की कृपा सदैव बनी हमारे प्रधान मंत्री जी के ऊपर




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1 year ago | [YT] | 5

Acharya Bhanu Pratap Shukla

निश्चित रूप से! "यदा यदा हि धर्मस्य" यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय से है, जो भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है। यह श्लोक धर्म के ह्रास और भगवान के अवतार के उद्देश्य को बताता है।

श्लोक:

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

अर्थ:

हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म का पतन होता है और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।
साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए, और धर्म की स्थापना के लिए, मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ।

व्याख्या:

• यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति: जब-जब धर्म कमजोर होता है, उसका आचरण कम हो जाता है, और लोग धार्मिक मूल्यों को भूल जाते हैं।
• अभ्युत्थानमधर्मस्य: और जब-जब अधर्म बढ़ता है, पाप और अन्याय का बोलबाला होता है, और लोग गलत रास्ते पर चलने लगते हैं।
• तदात्मानं सृजाम्यहम्: तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ, यानी मैं अवतार लेता हूँ।
• परित्राणाय साधूनां: साधुओं की रक्षा के लिए, जो धार्मिक और नेक लोग हैं, उन्हें अधर्म से बचाने के लिए।
• विनाशाय च दुष्कृताम्: दुष्टों के विनाश के लिए, जो अधर्मी और पापी हैं, उन्हें दंडित करने के लिए।
• धर्मसंस्थापनार्थाय: धर्म की फिर से स्थापना के लिए, ताकि लोग फिर से धार्मिक मूल्यों का पालन करें और सही रास्ते पर चलें।
• सम्भवामि युगे युगे: मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ, हर युग में जब धर्म का पतन होता है और अधर्म बढ़ता है।

यह श्लोक हमें यह याद दिलाता है कि भगवान हमेशा धर्म की रक्षा करते हैं और अधर्म का नाश करते हैं। यह हमें धार्मिक मूल्यों का पालन करने और हमेशा सही रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

1 year ago | [YT] | 5

Acharya Bhanu Pratap Shukla

भगवान श्री कृष्ण की जन्माष्टमीकी शुभकामनाएं आपके जीवन में भगवान भगवान वासुदेव कृष्ण कृपा दृष्टिबनाए रखें और आप निरंतर भगवान के चरणशरण में लगे 🙏

• इति विज्ञायते शास्त्रे निर्णीतं ब्रह्मवादिभिः।
देवक्या जठरे विष्णुः प्रादुरासीद्युगे युगे॥

• अर्थ: ऐसा शास्त्रों में जाना जाता है और ब्रह्मवादियों द्वारा यह निर्णय लिया गया है कि प्रत्येक युग में विष्णु देवकी के गर्भ से प्रकट होते हैं।


• अथ सर्वगुणोपेतः कालः परमशोभनः।
यर्हि जज्ञेऽजनो जन्तुः प्रायो मोद प्रमोदभाक्॥

• अर्थ: जब अजन्मा (श्रीकृष्ण) का जन्म हुआ, तो सभी गुण युक्त, परम शोभायमान समय था। उस समय प्रायः सभी प्राणी आनंद और प्रसन्नता से भर गए थे।

• तं दृष्ट्वा देवकी देवी वासुदेवोऽथ विस्मितौ।
अचिंत्यमिदमित्याहुर्निगूढं तत्समाचरन्॥

• अर्थ: श्रीकृष्ण को देखकर देवकी देवी और वासुदेव दोनों ही आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने कहा, "यह अचिंत्य है," और उस रहस्य को छिपाए रखने का निश्चय किया यह श्लोक श्रीमद्भागवतम् में भगवान विष्णु की स्तुति में आता है। यह भगवान की सत्यता और शाश्वतता को दर्शाता है। यहाँ श्लोक और उसका अर्थ प्रस्तुत है:

श्लोक:

• सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये।
सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः॥

अर्थ:

• सत्यव्रतं: जो सत्य का व्रत धारण करने वाले हैं, यानी जिनका संकल्प हमेशा सत्य पर आधारित होता है।
• सत्यपरं: जो परम सत्य हैं, जिनसे बढ़कर कोई सत्य नहीं।
• त्रिसत्यं: जो तीनों कालों (भूत, भविष्य, वर्तमान) में सत्य हैं, यानी जिनका अस्तित्व कभी नहीं मिटता।
• सत्यस्य योनिं: जो सत्य के मूल कारण हैं, जिनसे सत्य उत्पन्न होता है।
• निहितं च सत्ये: जो सत्य में ही स्थित हैं, यानी जिनका निवास सत्य में ही है।
• सत्यस्य सत्यं: जो सत्य का भी सत्य है, यानी परम सत्य।
• ऋतसत्यनेत्रं: जो ऋत (प्राकृतिक नियम, व्यवस्था) और सत्य के नेत्र हैं, यानी जो प्राकृतिक नियमों और सत्य को देखने वाले हैं या जिनके द्वारा यह जगत सत्य रूप में प्रकाशित है।
• सत्यात्मकं: जो सत्य स्वरूप हैं, यानी जिनका स्वभाव ही सत्य है।
• त्वां शरणं प्रपन्नाः: हम आपकी शरण में आए हैं।

1 year ago | [YT] | 7

Acharya Bhanu Pratap Shukla

श्लोक:

यत्पादाब्जनखोदकं त्रिजगतां पापौघविध्वंसनं
यन्नामामृतपूरकं च पिबतां संसारसंतारकम् ।
पाषाणोऽपि यदङ्घ्रिपद्मरजसा शापान्मुनेर्मोचित आ
र्तत्राणपरायणः स भगवान् नारायणो मे गतिः ॥

अर्थ:

जिनके चरण-कमलों के नखों से निकली गंगा तीनों लोकों के पापों का नाश करने वाली है, जिनके नाम का अमृत पीने वालों को संसार सागर से पार करने वाला है, तथा जिनके चरण-कमलों की रज से पत्थर भी मुनि के शाप से मुक्त हो गया, वे शरणागतों की रक्षा में तत्पर भगवान नारायण ही मेरी एकमात्र गति हैं।

अगला श्लोक:

नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः ।
नारायणपरा लोका नारायणपरा मखाः ॥
नारायणपरो योगो नारायणपरं तपः ।
नारायणपरं ज्ञानं नारायणपरा गतिः ॥

अर्थ:

वेद नारायण के परायण हैं, देवता नारायण के ही अंगों में उत्पन्न हुए हैं। लोक नारायण के परायण हैं और यज्ञ भी नारायण के लिए ही किए जाते हैं। योग नारायण के परायण है, तपस्या नारायण के लिए है, ज्ञान नारायण के परायण है और गति भी नारायण के लिए है।

यह श्लोक भगवान नारायण की महिमा का वर्णन करता है और बताता है कि वे ही एकमात्र आश्रय और गति हैं। यह भी बताता है कि सारे वेद, देवता, लोक, यज्ञ, योग, तप और ज्ञान नारायण के ही अंश हैं और उन्हीं को समर्पित हैं।
🚩🚩जय श्रीमन्नारायण 🚩🚩

1 year ago | [YT] | 7

Acharya Bhanu Pratap Shukla

भगवान श्री राम लला सरकार का प्रथम दर्शन दिव्य अलौकिक सौंदर्य

2 years ago | [YT] | 11