मुझे जटिल मुद्दों को सरल देशी शब्दों में समझाना पसंद है।
न्याय,आत्म सम्मान,जागरूकता और संविधान द्वारा दिए गए समानता के अधिकारों को संविधान के दायरे में आवाज उठाना इस चैनल का उद्देश्य है। कपिल फौजी एक पूर्व सैनिक हैं। जिनकी विशेषज्ञता जटिल विषयों को सरल देशी भाषा और वस्तुनिष्ठ तरीके से समझाने में निहित है।
अपने जीवन में समानता, स्वाभिमान, आत्म सम्मान महत्वपूर्ण चीज़ों के बारे में खुद को शिक्षित करें और सीखें कि आप दुनिया को अपने लिए और बाकी सभी के लिए एक बेहतर जगह कैसे बना सकते हैं!
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साबका सैनिक संघर्ष कमेटी
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Kapil fauji chahar Sainik
राहुल गांधी ने कोहनियां मार-मार कर कांग्रेश कार्यकताओ को पहुँचाया हॉस्पिटल।
💥 राहुल गांधी जी, ये कार्यकर्ता आपकी ताकत हैं या आपकी कोहनियाँ खाने के लिए आए हैं? 💥
आज राहुल गांधी के प्रोटेस्ट मार्च के वीडियो देखकर सच में बहुत बुरा लगा!
सैकड़ों वीडियो में एक ही चीज़ बार-बार दिखाई दी—राहुल गांधी आगे बढ़ रहे थे और उनके साथ कोहनियाँ भी चल रही थीं। कहीं छाती पर, कहीं पेट पर, तो कहीं चेहरे के आसपास धक्कामुक्की और कोहनियाँ दिखाई दीं।
अब सफाई आएगी कि भीड़ बहुत थी, आगे महिलाएँ थीं, सुरक्षा की समस्या थी। चलिए, आपकी बात मान लेते हैं कि भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल था। लेकिन सवाल यह है कि जब आप देशभर के कार्यकर्ताओं को दिल्ली बुलाते हैं, तो क्या उनके बीच खड़े होने और उनका प्यार स्वीकार करने की सहनशक्ति भी नहीं होनी चाहिए?
🔥 राहुल गांधी जी, आज आप जिस मार्च में चल रहे थे, वह मार्च किसकी बदौलत था?
इन कार्यकर्ताओं की बदौलत!
कोई मध्य प्रदेश से आया होगा, कोई बिहार से, कोई पंजाब से, कोई कर्नाटक से, तो कोई तमिलनाडु से।
किसी ने ट्रेन पकड़ी होगी, किसी ने बस, किसी ने अपनी जेब से पैसे खर्च किए होंगे। कई लोग घंटों का सफर करके सिर्फ इसलिए दिल्ली पहुँचे होंगे, क्योंकि उन्हें लगता है कि राहुल गांधी उनके नेता हैं और उनकी लड़ाई लड़ रहे हैं।
अब जरा उस कार्यकर्ता की भावनाओं को समझिए!
वह अपने नेता को सामने देखकर हाथ मिलाना चाहता है। दो शब्द बोलना चाहता है। एक फोटो खिंचवाना चाहता है। वह अपने नेता के साथ कुछ कदम चलकर उस पल को यादगार बनाना चाहता है।
उसके लिए वह सिर्फ एक फोटो नहीं है, बल्कि अपने नेता के प्रति विश्वास और अपने राजनीतिक संघर्ष की एक याद है।
लेकिन अगर उसी कार्यकर्ता को अपने नेता तक पहुँचने के लिए धक्के खाने पड़ें, कोहनियाँ झेलनी पड़ें और बार-बार पीछे धकेला जाए, तो उसके दिल पर क्या गुजरती होगी?
क्या कार्यकर्ता सिर्फ नारे लगाने के लिए हैं?
क्या वे सिर्फ भीड़ बढ़ाने के लिए हैं?
क्या उनका काम सिर्फ राहुल गांधी जिंदाबाद के नारे लगाना है?
या फिर उनका भी कोई दिल है, कोई भावना है, कोई सम्मान है?
⚡ नेता बनने के लिए भीड़ चाहिए, लेकिन नेता होने के लिए दिल भी चाहिए!
राहुल गांधी जी, जब आप लोगों से कहते हैं कि दिल्ली आ जाइए, संघर्ष कीजिए, लोकतंत्र बचाइए, तो लोग आपकी आवाज पर आते हैं।
क्या आप हाथ जोड़कर उनका स्वागत नहीं कर सकते?
क्या आप मुस्कुराकर उनसे नहीं कह सकते कि आप इतनी दूर से आए, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद?
अगर भीड़ इतनी ज्यादा थी कि पैदल चलना मुश्किल हो रहा था, तो सुरक्षा के लिए दूसरे इंतजाम किए जा सकते थे। महिलाओं और दूसरे कार्यकर्ताओं के लिए अलग व्यवस्था हो सकती थी। जरूरत पड़ती तो वाहन का इस्तेमाल भी किया जा सकता था।
लेकिन सवाल यह है कि जब आप जनता के बीच राजनीति करने निकले हैं, तो जनता के बीच चलने का धैर्य भी तो दिखना चाहिए!
नेता का कद उसकी सुरक्षा में खड़े लोगों की संख्या से नहीं, बल्कि उसके सामने खड़े कार्यकर्ताओं के प्रति उसके व्यवहार से पता चलता है।
💣 और अगर यही हाल रहा, तो फिर कार्यकर्ता किसके लिए संघर्ष करेगा?
जरा सोचिए, जिस देश में विपक्ष लोकतंत्र की रक्षा करने का दावा कर रहा है, वहाँ विपक्ष के अपने नेता का अपने ही कार्यकर्ताओं के साथ व्यवहार चर्चा का विषय बन जाए, तो इसका राजनीतिक फायदा किसे मिलेगा?
मौजूदा सरकार को!
जिस सरकार पर विपक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने, असहमति की आवाज दबाने और नागरिकों की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के आरोप लगाता रहा है, उसके सामने विपक्ष को अपनी एकजुटता, अनुशासन और नेतृत्व का उदाहरण पेश करना चाहिए।
लेकिन अगर विपक्ष अपने ही कार्यकर्ताओं की भावनाओं को समझने में विफल दिखाई देगा, तो वह सरकार को सवालों के घेरे में खड़ा करने के बजाय खुद सवालों के घेरे में आ जाएगा।
सरकार की गलतियों से विपक्ष मजबूत नहीं होता; विपक्ष अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से निभाकर मजबूत होता है।
और याद रखिए, लोकतंत्र में सत्ता पक्ष की जवाबदेही जितनी जरूरी है, विपक्ष की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।
🔥 एक बात और सुन लीजिए!
अगर कल को पिंकी चौधरी या कोई दूसरा नेता अपने पाँच-दस समर्थकों के साथ खड़ा होकर अपनी ताकत दिखाने की कोशिश करे, तो.? यही कार्यकर्ता उनके आगे खड़े हो जाएंगे और नही हुए तो Reel बन जाएंगी.?
राहुल गांधी के पास देशभर में कार्यकर्ता हैं, एक बड़ा राजनीतिक मंच है और करोड़ों लोगों तक अपनी बात पहुँचाने का अवसर है।
लेकिन सवाल यही है कि इतनी बड़ी राजनीतिक ताकत होने के बावजूद अगर नेता अपने कार्यकर्ताओं के साथ सहज होकर नहीं चल सकता, तो फिर उस ताकत का फायदा क्या है?
कार्यकर्ताओं की भीड़ बुलाना आसान है, उनका विश्वास बनाए रखना मुश्किल।
नारे लगवाना आसान है, उन नारों के पीछे छिपी भावनाओं को समझना मुश्किल।
और सबसे मुश्किल है—अपने समर्थकों को यह एहसास कराना कि वे केवल संख्या नहीं, बल्कि आंदोलन की आत्मा हैं।
💔 आज सबसे ज्यादा दुख किस बात का है?
दुख इस बात का नहीं कि राहुल गांधी के आसपास भीड़ थी।
दुख इस बात का है कि उस भीड़ में ऐसे लोग भी थे, जो शायद सिर्फ अपने नेता से मिलने की उम्मीद लेकर आए थे।
उनके मन में कितना उत्साह रहा होगा! उन्होंने अपने परिवार, अपने काम और अपनी जिम्मेदारियों से समय निकाला होगा। वे सोचकर आए होंगे कि आज अपने नेता के साथ खड़े होंगे।
लेकिन अगर उन्हें उसी दौरान धक्कामुक्की और कोहनियाँ झेलनी पड़ीं, तो उनकी भावनाओं को समझना चाहिए।
हाँ, यह भी जरूरी है कि वीडियो के पूरे संदर्भ को देखा जाए। भीड़ में सुरक्षा कर्मियों और नेताओं के बीच धक्कामुक्की के कई कारण हो सकते हैं। केवल कुछ वीडियो देखकर हर कोहनी के पीछे की मंशा तय नहीं की जा सकती।
लेकिन इतना तो तय है कि किसी भी बड़े नेता की जिम्मेदारी सिर्फ अपने आसपास की भीड़ को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि अपने समर्थकों की गरिमा और सुरक्षा का भी ध्यान रखना है।
🎯 राहुल गांधी जी, अंतिम सवाल आपसे है!
आप देश का नेतृत्व करने का सपना देखते हैं।
आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को चुनौती देते हैं।
आप लोकतंत्र बचाने की बात करते हैं।
आप वोट चोरी के मुद्दे पर संघर्ष करते हैं।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि आपके साथ सड़कों पर उतरने वाले कार्यकर्ता आपसे क्या उम्मीद रखते हैं?
वे आपसे सत्ता की गारंटी नहीं माँगते।
वे आपसे हर बार जीत की गारंटी नहीं माँगते।
वे आपसे सिर्फ इतना चाहते हैं कि आप उन्हें अपना समझें, उनकी मेहनत का सम्मान करें और जरूरत पड़ने पर उनके बीच खड़े हों।
क्योंकि जिस दिन कार्यकर्ता को यह लगने लगा कि नेता को उसकी जरूरत सिर्फ भीड़ जुटाने तक है, उस दिन आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत कमजोर पड़ने लगती है।
राहुल गांधी जी, सरकार से लड़ना है तो लड़िए। लोकतंत्र की रक्षा करनी है तो पूरी ताकत से कीजिए। वोट चोरी के आरोपों पर सवाल उठाने हैं तो उठाइए और उनका जवाब माँगिए।
लेकिन अपने ही कार्यकर्ताओं के दिल मत तोड़िए!
क्योंकि याद रखिए—
नेता मंच से आंदोलन की घोषणा करता है, लेकिन उस आंदोलन को सड़क पर कार्यकर्ता खड़ा करता है।
नेता की पहचान उसका नाम बनाता है, लेकिन उस नाम को ताकत उसके कार्यकर्ता देते हैं।
और जिस दिन नेता अपने कार्यकर्ताओं की भावनाओं से बड़ा हो गया, उस दिन उसे अपनी लोकप्रियता नहीं, अपने नेतृत्व पर सवाल उठाने चाहिए।
राहुल गांधी जी, कार्यकर्ता आपकी ताकत हैं, आपकी कमजोरी नहीं। वे आपके आंदोलन की आत्मा हैं, भीड़ का हिस्सा भर नहीं।
उन्हें अपनी कोहनियों से नहीं, अपने प्यार और सम्मान से जीतिए!
क्योंकि लोकतंत्र की लड़ाई लड़ने वाला नेता अगर अपने ही लोगों का दिल नहीं जीत पाया, तो फिर वह देश का दिल कैसे जीतेगा?
आज सवाल सिर्फ राहुल गांधी की कोहनियों का नहीं है, सवाल उनके नेतृत्व, उनके धैर्य और अपने कार्यकर्ताओं के प्रति उनके सम्मान का है!
Kapil fauji chahar
1 week ago | [YT] | 4
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Kapil fauji chahar Sainik
😂 वाह राहुल गांधी जी, आपकी ईमानदारी और अनुशासन को सलाम!
मैं तो पहले सोच रहा था कि राहुल गांधी जी सिर्फ अपने कार्यकर्ताओं को ही कोहनी मारते हैं। लेकिन अब समझ आया कि मामला भेदभाव का नहीं, बल्कि सबके साथ एक जैसा व्यवहार करने का है! 🤣
छह कार्यकर्ता हों या छह मुख्यमंत्री, सबके साथ बराबरी का सिद्धांत!
कार्यकर्ता सामने आए तो कोहनी से स्वागत, मुख्यमंत्री सामने आए तो कॉलर पकड़कर संवाद! 😂
यही तो है असली समानता—न कोई अपना, न कोई पराया; सबके लिए एक जैसा व्यवहार, बस तरीका थोड़ा अलग-अलग!
देश को भी ऐसे ही बहादुर, अनुशासित और एकरूपता में विश्वास रखने वाले नेतृत्व की ज़रूरत है!
राहुल जी, आपके इस अनोखे अनुशासन को देखकर तो यही लगता है—लोकतंत्र में संवाद के तरीके अनेक हैं, लेकिन आपका स्टाइल सबसे निराला है! 😜🔥
1 week ago | [YT] | 7
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Kapil fauji chahar Sainik
🔥 राहुल गांधी के पीछे पड़े ये चार चेहरे आखिर चाहते क्या हैं? वोट चोरी के बड़े मुद्दे को ठंडा करने की रणनीति है या महज़ संयोग? घटनाक्रम को जोड़कर देखिए!
12 अक्टूबर के घटनाक्रम को केवल दो अलग-अलग प्रदर्शनों की तरह मत देखिए। ज़रा ठहरिए, पूरी तस्वीर को समझिए, फिर सवाल पूछिए!
एक तरफ INDIA गठबंधन का वोट चोरी के मुद्दे पर बड़ा प्रदर्शन था। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी का अलग प्रदर्शन था, जिसमें आपके बताए अनुसार लगभग 50–60 लोग थे और जिसका नेतृत्व संजय सिंह तथा गोपाल राय कर रहे थे। उनकी हिरासत की भी खबर सामने आई।
अब सवाल यह है कि जब एक बड़ा विपक्षी आंदोलन चल रहा हो, तब उसी समय होने वाले दूसरे प्रदर्शन की रणनीति, उसके तरीके और उसके राजनीतिक प्रभाव को समझना कितना ज़रूरी है?
अगर एक प्रदर्शन शांतिपूर्ण मार्च के रूप में आगे बढ़ रहा हो और दूसरे में बैरिकेड हटाने या तोड़ने की तस्वीरें सामने आएँ, तो दोनों के बीच अंतर समझना चाहिए। क्योंकि राजनीतिक लड़ाइयों में केवल नारे नहीं चलते, तस्वीरें भी चलती हैं। कैमरे केवल घटना नहीं दिखाते, वे अक्सर पूरी बहस की दिशा भी बदल देते हैं।
कल्पना कीजिए, अगर अलग-अलग विपक्षी दलों के हजारों कार्यकर्ता एक ही जगह मौजूद होते और किसी घटनाक्रम से भीड़ का तनाव बढ़ जाता, तो उसका राजनीतिक नुकसान किसे होता? आंदोलन के मूल मुद्दे को या उन लोगों को, जो उस मुद्दे पर सवाल उठा रहे हैं?
यह एक सवाल है, जिसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। लेकिन इस सवाल को पूछने के लिए किसी साज़िश को पहले से साबित मान लेना भी उचित नहीं होगा।
अब आइए, दूसरे घटनाक्रम पर!
13 अक्टूबर को CJP के दो नेताओं के जंतर-मंतर पहुँचने और हिरासत में लिए जाने की खबर के संदर्भ में कुछ सीधे सवाल हैं।
अगर पहले से अनुमति माँगने की बात कही जा रही थी, तो फिर प्रदर्शन के समय और तरीके को लेकर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं थी? अगर पाँच से अधिक लोगों के एकत्र होने पर रोक लागू थी, तो दो लोगों के पहुँचने से किस नियम का उल्लंघन हुआ? और यदि वे पहले भी वहाँ जा सकते थे, तो 12 अक्टूबर के बड़े विपक्षी प्रदर्शन में शामिल होने के बजाय अलग समय और अलग तरीके को क्यों चुना?
इन सवालों के जवाब संबंधित नेताओं से माँगे जाने चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना भी अधिकार है और जवाब देना भी राजनीतिक जवाबदेही का हिस्सा है।
लेकिन असली सवाल इससे भी बड़ा है।
जब मुद्दा वोट चोरी का हो, तो बहस राहुल गांधी के व्यवहार, किसी दूसरे नेता की गिरफ्तारी या किसी तीसरे दल की राजनीतिक नौटंकी तक सीमित क्यों हो जाए?
अगर चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप हैं, तो उनका जवाब तथ्यों से मिलना चाहिए। अगर मतदाता सूची पर सवाल हैं, तो उनका जवाब पारदर्शिता से मिलना चाहिए। अगर किसी नागरिक के मताधिकार पर संदेह पैदा हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
क्योंकि वोट केवल कागज़ पर लगी एक मुहर नहीं है। वोट उस गरीब की उम्मीद है, जो सरकार से न्याय माँगता है। वोट उस किसान की आवाज़ है, जिसकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता। वोट उस नौजवान का भविष्य है, जो रोजगार की तलाश में भटक रहा है। वोट उस नागरिक की ताकत है, जिसके पास सत्ता के सामने खड़े होने का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक अधिकार है।
वोट की ताकत कमजोर हुई, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होगी।
और इसलिए यह मुद्दा किसी एक नेता का निजी एजेंडा नहीं हो सकता। राहुल गांधी इसे उठा रहे हैं, तो सवालों के जवाब दीजिए। आम आदमी पार्टी इसे उठाती है, तो उससे भी सवाल पूछिए। CJP या कोई अन्य संगठन सामने आता है, तो उससे भी जवाबदेही माँगिए।
लेकिन किसी भी दल के व्यवहार को पूरे मुद्दे का विकल्प मत बनने दीजिए।
यही वह बिंदु है, जहाँ जनता को सबसे ज्यादा सतर्क रहने की ज़रूरत है। राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा अपनी जगह है, लेकिन मतदाता के अधिकारों से जुड़ा सवाल उससे कहीं बड़ा है।
अगर किसी आंदोलन की चर्चा उसके मूल मुद्दे से हटकर नेताओं की कोहनियों, कॉलर पकड़ने, गिरफ्तारी और आपसी आरोप-प्रत्यारोप तक सिमट जाए, तो अंत में फायदा किसे होगा?
इसका जवाब किसी के इरादे पर बिना सबूत फैसला सुनाकर नहीं, बल्कि घटनाओं, प्रमाणों और उनके वास्तविक प्रभाव को देखकर देना चाहिए।
फिर भी एक बात बिल्कुल साफ है—यदि विपक्षी दल आपस में ही एक-दूसरे की विश्वसनीयता पर हमला करते रहेंगे, तो जनता के असली सवाल पीछे छूट सकते हैं। और अगर किसी राजनीतिक घटनाक्रम का परिणाम सत्ता पक्ष को राहत पहुँचाता है, तो उस परिणाम की समीक्षा होनी चाहिए; लेकिन केवल परिणाम के आधार पर किसी गुप्त रणनीति को सिद्ध नहीं माना जा सकता।
याद रखिए—चेहरे बदलते रहेंगे, पार्टियाँ आती-जाती रहेंगी, नेता बनेंगे और बिगड़ेंगे। लेकिन वोट का अधिकार कमजोर हुआ, तो नुकसान पूरे देश के नागरिक का होगा।
इसलिए किसी नेता की जय-जयकार या किसी दल की निंदा करने से पहले एक सवाल खुद से पूछिए:
क्या हम उस मुद्दे पर बात कर रहे हैं, जो देश के लोकतंत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण है, या हम राजनीतिक चेहरों की लड़ाई में उलझकर असली सवाल को पीछे छोड़ रहे हैं?
राहुल गांधी से सवाल पूछिए। आम आदमी पार्टी से भी पूछिए। CJP से भी पूछिए। लेकिन वोट चोरी के आरोपों की निष्पक्ष जाँच और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता का सवाल मत छोड़िए।
क्योंकि लोकतंत्र किसी नेता की जागीर नहीं है।
लोकतंत्र जनता का है, वोट जनता का है और जवाबदेही भी जनता के प्रति ही होनी चाहिए! 🇮🇳🔥
1 week ago | [YT] | 49
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Kapil fauji chahar Sainik
10 साल का इंतजार खत्म? अब हर 5 साल में Pay Revision और पेंशन में हर साल 7% बढ़ोतरी! बड़ी बैठक खत्म। पूरी खबर 👉 https://youtu.be/fD97gPGh-n4
1 month ago | [YT] | 51
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Kapil fauji chahar Sainik
*🇮🇳 पूर्व सैनिक भाइयों के लिए एक जरूरी अपील 🇮🇳*
*अगर आप OROP, Military Service Pay, Disability Pension, पेंशन के अधिकार, 8वें वेतन आयोग और देशभर के लाखों पूर्व सैनिकों से जुड़ी ताज़ा और काम की खबरें जानना चाहते हैं, तो हमारे WhatsApp चैनल से जरूर जुड़िए।*
*यहाँ कोशिश सिर्फ खबर चलाने की नहीं है…*
*खबर की सच्चाई सामने रखने की है।*
*आज सोशल मीडिया और कई चैनलों पर 8वें वेतन आयोग, पेंशन बढ़ोतरी, फिटमेंट फैक्टर और पूर्व सैनिकों से जुड़े मुद्दों पर तरह-तरह की खबरें चल रही हैं।*
*किस खबर में कितना दम है, क्या सच है और क्या सिर्फ हवा बनाई जा रही है—* *हम उसी का पोस्टमार्टम करते हैं।*
*🔴 कपिल फौजी का सीधा सिद्धांत है—*
*सुई की नोक पर सच, डंके की चोट पर सच।*
*चाहे खबर हमारे पक्ष में हो या हमारे खिलाफ—*
*पहले जांच, फिर बात।*
अगर आप जानना चाहते हैं कि:
*🇮🇳 8वें वेतन आयोग में वास्तव में क्या चल रहा है?*
*🇮🇳 कर्मचारियों और पेंशनरों की बढ़ोतरी को लेकर क्या तथ्य हैं?*
*🇮🇳 OROP में आगे क्या अपडेट है?*
*🇮🇳 Disability Pension से जुड़े नए फैसले क्या हैं?*
*🇮🇳 Military Service Pay और पूर्व सैनिकों के दूसरे मुद्दों पर सरकार/कोर्ट में क्या हो रहा है?*
*🇮🇳 सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनलों पर चल रही खबर में कितना सच और कितना भ्रम है?*
*तो इस WhatsApp चैनल से जुड़ जाइए।*
*👉 यह चैनल उन भाइयों के लिए है जिन्हें खबर चाहिए—अफवाह नहीं।*
*👉 तथ्य चाहिए—फॉरवर्ड की हुई अधूरी जानकारी नहीं।*
*👉 सच चाहिए—चाहे सच किसी के भी पक्ष में हो।*
*और एक बात बिल्कुल साफ़ है… 😎*
*जिस भाई को कपिल फौजी की बेबाक बातों और तथ्यों पर भरोसा है, वही जुड़े।*
*जिन्हें हर बात में बेवजह विवाद करना है, बिना तथ्य के बहस करनी है या माहौल खराब करना है*—
*उन भाइयों के लिए यह मंच नहीं है।*
*बाकी भाई आराम से अपनी कैंटीन की लाइन लगाएँ,*
*सत्तर रुपये वाली रम लें और घर जाकर चैन से सो जाएँ। 😂🥃*
*क्योंकि यहाँ अफवाह नहीं, खबर चलेगी।*
*चापलूसी नहीं, सवाल होंगे।*
*और सबसे ऊपर—पूर्व सैनिक का हित होगा। 🇮🇳*
जय हिंद 🇮🇳
जय हिंद की फौज 🇮🇳
जय पूर्व सैनिक 🇮🇳
👉 *WhatsApp चैनल से जुड़िए और अपने दूसरे पूर्व सैनिक भाइयों तक भी यह संदेश पहुँचाइए।*
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1 month ago | [YT] | 114
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Kapil fauji chahar Sainik
जम्मू-कश्मीर के डोडा में सेना की गाड़ी के गहरी खाई में गिरने की खबर है, बताया जा रहा है कि 10 जवान शहीद हो चुके और कुछ गंभीर रूप से घायल हैं जो कि बेहद पीड़ादायक और हृदय विदारक है ।।
सभी वीर शहीदों को कोटि-कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए कामना करता हूँ कि भगवान उनके परिजनों इस दुःख की घड़ी में हिम्मत दे, साथ ही घायल जवान शीघ्र स्वस्थ होकर लौटें 🙏🏼
9 months ago | [YT] | 117
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Kapil fauji chahar Sainik
सभी बहन भाई, काका काकी, ताऊ ताई, दादा दादी को दिवाली की बहुत बहुत शुभकामनाएं 🔥
#chandigarh
1 year ago | [YT] | 290
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Kapil fauji chahar Sainik
आप सभी भाई बहनों को दीपावली की बहुत शुभकामनाएं। एक दीपक देश के शहीदों के नाम का भी जरूर जलाना। 🪔🙏
1 year ago | [YT] | 14
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Kapil fauji chahar Sainik
*अपनी जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा करने वाले अग्निवीरों का मासिक वेतन 22,000/₹ और मंदिर में बैठकर पूजा करने वालों का 90,000 मासिक वेतन और साथ में राज्य कर्मचारी का दर्जा भी प्राप्त होगा।*
ये नया भारत है।
*धर्म नहीं यह धंधा है।*
*यहां पढ़ा लिखा भी अंधा है।।*
*अमृत काल ..*
*यह किसके लिए है .... समझिए ....*
1 year ago | [YT] | 48
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Kapil fauji chahar Sainik
अगर नेपाल का आंदोलन भ्रष्टाचार, सोशल मीडिया पर प्रतिबंध, नेपोटिज्म और बेरोजगारी के ख़िलाफ़ है तो दैनिक जागरण इसे हिंदू राष्ट्र की माँग में होने वाला आंदोलन क्यों बता रहा है?
क्या ये अख़बार झूठ फैला रहा है?
ये अख़बार झूठ क्यों फैला रहा है?
1 year ago | [YT] | 15
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