हम कहाँ जा रहे हैं, क्या हो रहा है हमें? हम अपने अंदर के इंसानियत को क्यों खोते जा रहे हैं, या यूं कहें खत्म करते जा रहे हैं... और उलझते जा रहे हैं हिंदू-मुसलमान में। धर्मान्धता की अंधेरी कोठरी में खुद को , कैद करते जा रहे हैं.......। इंसानियत खोती सी चली जा रही है , नफरत की आंधी में........। क्या हमें सनातन नफरत परोसने कहता है....? क्या ये सर्वधर्म सद्भाव का संदेश नहीं देता? अल्लाह या ईशू भी तो प्रेम का संदेश देते हैं...। फिर कयों नहीं इंसान वैमनस्य छोड़ , इंसानियत का परचम लहराता है? शिक्षा को सही मायने में अपना कर क्यों नहीं खुद का विकास करता है....? नेताओं का क्या,अपनी गद्दी सुरक्षित रखने के लिए , जनता के बीच मतभेद पैदा करते हैं...। वे अपना स्वार्थ साधते हैं। भोले भाले बच्चे जिनके हाथों में कांपी किताब रहना चाहिए, उनके छोटे- छोटे प्रलोभन में आ कर, गलत राह पर चल निकलते हैं...। न ही वे अपने भविष्य और न ही अपने माता पिता के.बारे में सोचते हैं...। वे अपनी सोचने समझने की शक्ति खो देते हैं, ऐसा कभी न करें स्वस्थ रहें व खुद में इंसानियत जिंदा रखे.... और उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर करें......। धन्यवाद।
रिश्ते हो तो मिठास से भरे हुए उन्हें निभाने में हिचक न हो.... उन्हें दिल से निभाओ सम्भव न हो सके तो थोड़ी दूरी बना कर रखो और यूँ ही चलते जाओ...... हाँ अगर कोई गलत समझे तो सफाई देने की कोई जरूरत नहीं... हाँ किसी से उम्मीद भी रखना सही नहीं, खुद पर रखो भरोसा हमेशा.....
जिंदगी तेज रफ्तार से बढ़ती चली जा रही है, एक के बाद एक जिम्मेदारियां सामने खड़ी मिली .... हमने खुले दिल से स्वागत किया सभी का, जिम्मेदारियों के समक्ष एक पैर पर खड़े रहे हम.... हाँ इस क्रम में खुद से ही बेगाने हो गए हम, भूल गए खुद को.... राह में ज़ख्म पर ज़ख्म मिलते गए, खुद से मिलने का व्यस्त जीवन में समय ही न था पास हमारे.... तो ज़ख्मों पर ध्यान गया ही नहीं, दिल में टीस है आत्मा थकी व ज़ख्मी है..... हर पल खुद से मिलने की आस लिए बैठी हूं , खुद से मिलने की जद्दोजहद में लगी हुई हूं, लगी हुई हूं मैं.......
कर्मों का.खेल निराला है कहीं धूप है तो कहीं छाया है सब अपने कर्मों के छत्र छाया में ही तो पल रहे हैं.... पर हे ईश्वर दिल दुखता है उन मासूमों का देख कर जो इस तरह पिस रहे इस जहां में... ये भी सत्य कि तुम्हारे पास अंबार है माफ़ी की... क्यूँ नहीं नवाज देते दो बूंद माफ़ी से उन मासूमों को जिंदगी थोड़ा संवर तो जाए उनका.... और सही राह पकड़ जीवन की कश्ती को मंजिल तक ले जाए....
अमृत काल है यारों , हर तरफ खुशियां ही खुशियां है .... लुफ़्त उठा लो .... राम राज्य ही तो है न , हमारे युवा सशक्त हुए हैं, है न! सबों को रोजगार मिला है , मंहगाई से क्या फर्क पड़ता है किसी को । चालिस करोड़ लोग पांच किलो राशन के लिए लाइन में खड़े हैं अमृत काल है न..... सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं सबों को पढ़ना लिखना ज़रूरी है क्या? पढ़ लिख कर सही को "सही" और ग़लत को "गलत" बोलेंगे तो अमृत काल खतरे में नहीं आ जायेगा? विषाक्त काल में "पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया" से हम अमृत काल में "अनपढ़ रहेगा इंडिया तभी तो सवाल नहीं करेगा इंडिया" तक पहुंच गये हैं.... अमृत काल है .... बेटियों की अस्मत लुटी जाती है, उन्हें तड़पाया जाता है, मार दिया जाता है। बच्चे मरते हैं, मां बच्चों के शव को गोद में लेकर रोती है, तड़पती है , बिखरती है तो क्या हुआ "नारी वंदन - नारी वंदन" की गूंज तो है न हमारे देश में। तड़पाने वाले, मारने वाले खुश हैं ,परिपूर्ण हैं .... उन्हें संरक्षण जो मिला है "महामानव" का... अंधभक्त खुश हैं, बहुत ही खुश हैं .... गोदी मिडिया की तो बात ही मत पूछो समय समय पर वे गुंगे, बहरे, और अंधे हो जाते हैं ... न्याय किस पंछी का नाम है? पता नहीं ... क्यों न्याय से रूबरू होए? जो रोता है रोने दो, जो तड़पता है तड़पने दो। जब अपनी पारी आएगी देखेंगे .... अभी अमृत काल है, अमृत काल अमृत काल "महामानव" के छत्र छाया में फल-फूल जो रहा है फल - फूल रहा है....
छुक छुक कर बढ़ती जाती रेल हमारी, मुसाफिरों को गंतव्य तक पहुंचाती रेल हमारी। राही चढ़ते हैं, उतरते हैं, और पहुंचते हैं गंतव्य तक अपने, सफर के दौरान अनेकोंनेक राही राह में मिलते हैं बिछड़ते हैं, और अंत में हर एक राही अकेले ही अपने गंतव्य पर उतर जाता है। वह अकेला होता है क्या हम सबकी जिंदगी एक रेलगाड़ी की तरह नहीं है? इस जिंदगी रूपी रेल में चढ़ते हैं राह में अनेकों से मिलते हैं और बिछड़ते हैं और अंत में अपने कर्मों के हिसाब से अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं यानी इस लोक को छोड़ परलोक के लिए प्रस्थान करते हैं ........
Happy Republic Day to all the Citizens of India, Let's celebrate it with Great Zeal and Enjoy Our Fundamentals Rights Provided by Our Constitution and Remember Our Heroes of the Drafting Committee of Our Constitution ... Jai Hind, Jai Sanvidhan.....
Dr. Vibha's Corner
हम कहाँ जा रहे हैं, क्या हो रहा है हमें?
हम अपने अंदर के इंसानियत को क्यों खोते जा रहे हैं,
या यूं कहें खत्म करते जा रहे हैं...
और उलझते जा रहे हैं हिंदू-मुसलमान में।
धर्मान्धता की अंधेरी कोठरी में खुद को ,
कैद करते जा रहे हैं.......।
इंसानियत खोती सी चली जा रही है ,
नफरत की आंधी में........।
क्या हमें सनातन नफरत परोसने कहता है....?
क्या ये सर्वधर्म सद्भाव का संदेश नहीं देता?
अल्लाह या ईशू भी तो प्रेम का संदेश देते हैं...।
फिर कयों नहीं इंसान वैमनस्य छोड़ ,
इंसानियत का परचम लहराता है?
शिक्षा को सही मायने में अपना कर
क्यों नहीं खुद का विकास करता है....?
नेताओं का क्या,अपनी गद्दी सुरक्षित रखने के लिए ,
जनता के बीच मतभेद पैदा करते हैं...।
वे अपना स्वार्थ साधते हैं।
भोले भाले बच्चे जिनके हाथों में
कांपी किताब रहना चाहिए,
उनके छोटे- छोटे प्रलोभन में आ कर,
गलत राह पर चल निकलते हैं...।
न ही वे अपने भविष्य और न ही
अपने माता पिता के.बारे में सोचते हैं...।
वे अपनी सोचने समझने की शक्ति खो देते हैं,
ऐसा कभी न करें स्वस्थ रहें
व खुद में इंसानियत जिंदा रखे....
और उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर करें......।
धन्यवाद।
डॉक्टर विभा झा
7.9.2026
1 month ago | [YT] | 5
View 3 replies
Dr. Vibha's Corner
खुद पर विश्वास रखो ,
चाहे पूरी दुनियां तुम पर शक कर रही हो,
क्योंकि जीत उसी की होती है ,
जो हार मानने से इंकार कर दे.....।
Dr. A.P.J. Abdul Kalam
2 months ago | [YT] | 3
View 5 replies
Dr. Vibha's Corner
इतना क़हर बरसाने के बाद ये अपने
परिवार का सामना कैसे करते होंगे ..
.
3 months ago | [YT] | 3
View 0 replies
Dr. Vibha's Corner
3 months ago | [YT] | 3
View 2 replies
Dr. Vibha's Corner
रिश्ते हो तो मिठास से भरे हुए
उन्हें निभाने में हिचक न हो....
उन्हें दिल से निभाओ
सम्भव न हो सके तो थोड़ी दूरी बना कर रखो
और यूँ ही चलते जाओ......
हाँ अगर कोई गलत समझे तो
सफाई देने की कोई जरूरत नहीं...
हाँ किसी से उम्मीद भी रखना सही नहीं,
खुद पर रखो भरोसा हमेशा.....
5 months ago | [YT] | 2
View 1 reply
Dr. Vibha's Corner
जिंदगी तेज रफ्तार से बढ़ती चली जा रही है,
एक के बाद एक जिम्मेदारियां सामने खड़ी मिली ....
हमने खुले दिल से स्वागत किया सभी का,
जिम्मेदारियों के समक्ष एक पैर पर खड़े रहे हम....
हाँ इस क्रम में खुद से ही बेगाने हो गए हम,
भूल गए खुद को....
राह में ज़ख्म पर ज़ख्म मिलते गए,
खुद से मिलने का व्यस्त जीवन में समय ही न था पास हमारे....
तो ज़ख्मों पर ध्यान गया ही नहीं,
दिल में टीस है आत्मा थकी व ज़ख्मी है.....
हर पल खुद से मिलने की आस लिए बैठी हूं ,
खुद से मिलने की जद्दोजहद में लगी हुई हूं,
लगी हुई हूं मैं.......
5 months ago | [YT] | 1
View 0 replies
Dr. Vibha's Corner
कर्मों का.खेल निराला है
कहीं धूप है तो कहीं छाया है
सब अपने कर्मों के छत्र छाया में
ही तो पल रहे हैं....
पर हे ईश्वर दिल दुखता है
उन मासूमों का देख कर
जो इस तरह पिस रहे इस जहां में...
ये भी सत्य कि तुम्हारे पास अंबार है माफ़ी की...
क्यूँ नहीं नवाज देते दो बूंद माफ़ी से उन मासूमों को
जिंदगी थोड़ा संवर तो जाए उनका....
और सही राह पकड़ जीवन की कश्ती को
मंजिल तक ले जाए....
5 months ago | [YT] | 2
View 0 replies
Dr. Vibha's Corner
अमृत काल है यारों ,
हर तरफ खुशियां ही खुशियां है ....
लुफ़्त उठा लो ....
राम राज्य ही तो है न ,
हमारे युवा सशक्त हुए हैं, है न!
सबों को रोजगार मिला है ,
मंहगाई से क्या फर्क पड़ता है किसी को ।
चालिस करोड़ लोग पांच किलो राशन
के लिए लाइन में खड़े हैं
अमृत काल है न.....
सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं
सबों को पढ़ना लिखना ज़रूरी है क्या?
पढ़ लिख कर सही को "सही" और ग़लत को "गलत" बोलेंगे तो अमृत काल खतरे में नहीं आ जायेगा?
विषाक्त काल में "पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया" से हम
अमृत काल में "अनपढ़ रहेगा इंडिया तभी तो सवाल नहीं करेगा इंडिया" तक पहुंच गये हैं....
अमृत काल है ....
बेटियों की अस्मत लुटी जाती है,
उन्हें तड़पाया जाता है, मार दिया जाता है।
बच्चे मरते हैं, मां बच्चों के शव को गोद में लेकर
रोती है, तड़पती है , बिखरती है तो क्या हुआ
"नारी वंदन - नारी वंदन" की गूंज तो है न हमारे देश में।
तड़पाने वाले, मारने वाले खुश हैं ,परिपूर्ण हैं ....
उन्हें संरक्षण जो मिला है "महामानव" का...
अंधभक्त खुश हैं, बहुत ही खुश हैं ....
गोदी मिडिया की तो बात ही मत पूछो
समय समय पर वे गुंगे, बहरे, और अंधे हो जाते हैं ...
न्याय किस पंछी का नाम है?
पता नहीं ...
क्यों न्याय से रूबरू होए?
जो रोता है रोने दो, जो तड़पता है तड़पने दो।
जब अपनी पारी आएगी देखेंगे ....
अभी अमृत काल है, अमृत काल
अमृत काल "महामानव" के छत्र छाया में
फल-फूल जो रहा है फल - फूल रहा है....
6 months ago | [YT] | 5
View 2 replies
Dr. Vibha's Corner
छुक छुक कर बढ़ती जाती रेल हमारी,
मुसाफिरों को गंतव्य तक पहुंचाती रेल हमारी।
राही चढ़ते हैं, उतरते हैं,
और पहुंचते हैं गंतव्य तक अपने,
सफर के दौरान
अनेकोंनेक राही राह में मिलते हैं बिछड़ते हैं,
और अंत में
हर एक राही अकेले ही अपने गंतव्य पर उतर जाता है।
वह अकेला होता है
क्या हम सबकी जिंदगी एक रेलगाड़ी की तरह नहीं है?
इस जिंदगी रूपी रेल में चढ़ते हैं
राह में अनेकों से मिलते हैं और बिछड़ते हैं
और अंत में अपने कर्मों के हिसाब से
अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं
यानी इस लोक को छोड़
परलोक के लिए प्रस्थान करते हैं ........
7 months ago | [YT] | 3
View 1 reply
Dr. Vibha's Corner
Happy Republic Day to all the Citizens of India,
Let's celebrate it with Great Zeal and Enjoy Our Fundamentals Rights Provided by Our Constitution and Remember Our Heroes of the Drafting Committee of Our Constitution ...
Jai Hind, Jai Sanvidhan.....
9 months ago | [YT] | 2
View 1 reply
Load more