HB DECODE

नमस्कार दोस्तों,
आज 14 सितंबर है, यानी हिंदी दिवस।
और आज मैं आप सभी से सिर्फ “हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ” कहने नहीं आई हूँ।
आज मैं आपसे एक ऐसी बात करना चाहती हूँ, जिस पर शायद हमें थोड़ा सोचने की जरूरत है।
हम हर साल हिंदी दिवस मनाते हैं।
स्टेटस लगाते हैं।
पोस्ट लिखते हैं।
स्कूलों में कार्यक्रम होते हैं।
बच्चे कविता सुनाते हैं।
हम एक-दूसरे को हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ देते हैं।
लेकिन मेरा सवाल है—
क्या हिंदी को सिर्फ 14 सितंबर को याद कर लेना ही काफी है?
दोस्तों, सबसे पहले मैं यह साफ कर दूँ कि मैं अंग्रेज़ी या किसी दूसरी भाषा के खिलाफ बिल्कुल नहीं हूँ।
आप अंग्रेज़ी सीखिए।
अपने बच्चों को अंग्रेज़ी सिखाइए।
उन्हें दूसरी भाषाएँ भी सिखाइए।
जितनी भाषाएँ आएँगी, उतना ही उनका ज्ञान बढ़ेगा।
लेकिन समस्या तब होती है जब दूसरी भाषा सीखते-सीखते हम अपनी भाषा को ही कम समझने लगते हैं।
आज बहुत से माता-पिता की इच्छा होती है कि उनका बच्चा अच्छे अंग्रेज़ी मीडियम स्कूल में पढ़े।
वह अच्छी अंग्रेज़ी बोले।
और अगर बच्चा बहुत अच्छी अंग्रेज़ी बोलता है, तो हमें लगता है कि बच्चा बहुत अच्छी शिक्षा ले रहा है।
लेकिन मैं आपसे एक बात पूछना चाहती हूँ—
अगर वही बच्चा अपनी दादी या नानी की हिंदी ठीक से न समझ पाए…
अपने घर के पुराने शब्द न समझ पाए…
हिंदी में कोई कहानी पढ़ने से बचे…
तो क्या हमें इस पर भी ध्यान नहीं देना चाहिए?
मैं एक अध्यापक हूँ।
इसलिए बच्चों को बहुत करीब से देखती हूँ।
कई बार बच्चा कोई चीज हिंदी में बोल देता है और माता-पिता तुरंत कहते हैं—
“नहीं बेटा, हिंदी में मत बोलो, इंग्लिश में बोलो।”
मान लीजिए बच्चा कहता है—“आलू।”
हम कहते हैं—“नहीं, Potato बोलो।”
अरे भाई, दोनों क्यों नहीं?
आप उसको यह क्यों नहीं बताते कि बेटा, इसे आलू भी कहते हैं और Potato भी कहते हैं।
एक भाषा सिखाने के लिए दूसरी भाषा छुड़वाना जरूरी क्यों है?
यही बात मैं हिंदी के लिए नहीं, हर मातृभाषा के लिए कह रही हूँ।
भारत में कितनी भाषाएँ हैं।
कितनी बोलियाँ हैं।
और हर भाषा के साथ उस परिवार की यादें, संस्कृति और पहचान जुड़ी होती है।
हम मातृभाषा शब्द बोलते हैं।
लेकिन कभी उसके मतलब पर ध्यान दिया?
मातृभाषा यानी वह भाषा जो बच्चा सबसे पहले अपने घर में सुनता है।
अपनी माँ से।
अपने पिता से।
दादा-दादी से।
नाना-नानी से।
तो अगर हम ही अपने बच्चों से अपनी भाषा में बात करना बंद कर देंगे, तो वह भाषा बच्चा सीखेगा कहाँ से?
किताब से?
एक दिन के स्कूल कार्यक्रम से?
या सिर्फ हिंदी दिवस की कविता से?
भाषा ऐसे नहीं बचती।
भाषा घर में बचती है।
बातचीत में बचती है।
कहानियों में बचती है।
हँसी-मजाक में बचती है।
और मुझे सबसे अजीब बात यह लगती है कि पूरे साल हम बच्चे को कहते हैं—
“इंग्लिश में बोलो।”
और 14 सितंबर को कहते हैं—
“बेटा, हिंदी दिवस की कविता याद कर लो।”
यह कैसा रिश्ता है अपनी भाषा के साथ?
अगर हम चाहते हैं कि बच्चा हिंदी का सम्मान करे, तो पहले हमें खुद करना होगा।
और सम्मान का मतलब यह नहीं कि हम किसी दूसरी भाषा को छोटा कर दें।
नहीं।
अंग्रेज़ी जरूरी है।
दूसरी भाषाएँ भी जरूरी हैं।
आज की दुनिया में communication बहुत महत्वपूर्ण है।
लेकिन अपनी भाषा को छोड़कर आगे बढ़ना क्या जरूरी है?
दुनिया के बहुत से देशों में लोग दूसरी भाषाएँ सीखते हैं, लेकिन अपनी भाषा बोलने में शर्म महसूस नहीं करते।
फिर हमारे यहाँ कभी-कभी ऐसा क्यों होता है कि हिंदी बोलने वाले व्यक्ति को कम पढ़ा-लिखा समझ लिया जाता है?
और अंग्रेज़ी बोलने वाले को तुरंत बहुत intelligent मान लिया जाता है?
ज्ञान का पैमाना सिर्फ भाषा कैसे हो सकती है?
अगर किसी को अच्छी अंग्रेज़ी आती है, बहुत अच्छी बात है।
अगर किसी को अच्छी हिंदी आती है, वह भी उतनी ही अच्छी बात है।
आज हिंदी दिवस पर मैं खासकर माता-पिता से एक छोटा सा अनुरोध करना चाहती हूँ।
आज अपने बच्चे के साथ 15–20 मिनट बैठिए।
सिर्फ हिंदी में बात कीजिए।
उनसे कोई पुरानी कहानी साझा कीजिए।
उनसे पूछिए कि वह दस हिंदी शब्द कितने अच्छे से जानते हैं।
कोई मुहावरा समझाइए।
अंताक्षरी खेलिए।
शब्दों का कोई छोटा सा खेल खेलिए।
अपने बचपन की कोई कविता सुनाइए।
अपनी दादी या नानी से सुना कोई शब्द उन्हें बताइए।
बच्चे भाषा ऐसे ही सीखते हैं।
प्यार से।
बातचीत से।
घर से।
दबाव से नहीं।
मैं यह बिल्कुल नहीं कह रही कि बच्चा सिर्फ हिंदी बोले।
मैं सिर्फ इतना कह रही हूँ—
अपने बच्चे को दुनिया से जरूर जोड़िए।
लेकिन उसकी जड़ों से मत काटिए।
उसे अंग्रेज़ी सिखाइए।
दूसरी भाषा सिखाइए।
लेकिन उसकी अपनी भाषा उससे इतनी दूर मत कर दीजिए कि कल वह अपनी ही मातृभाषा को किसी विदेशी भाषा की तरह देखने लगे।
सोचिए…
अगर हमारी आने वाली पीढ़ी हिंदी पढ़ तो ले लेकिन उसका भाव न समझ पाए…
अपने दादा-दादी की बातों को पूरी तरह न समझ पाए…
हमारी पुरानी कहावतों, मुहावरों और कहानियों से जुड़ न पाए…
तो क्या हमने उसे सच में आगे बढ़ाया?
या फिर आगे बढ़ाते-बढ़ाते पीछे कुछ बहुत कीमती छोड़ दिया?
दोस्तों, इस हिंदी दिवस पर मैं आप सभी से बस एक बात कहना चाहती हूँ।
दूसरी भाषाओं का सम्मान कीजिए।
हर भाषा सम्मान के योग्य है।
लेकिन अपनी भाषा को भी उतना ही सम्मान दीजिए।
हिंदी दिवस सिर्फ सोशल मीडिया की एक पोस्ट बनकर न रह जाए।
हिंदी हमारे घर की बातचीत में रहे।
हमारे बच्चों की कहानियों में रहे।
हमारी भावनाओं में रहे।
और सबसे जरूरी—
हिंदी बोलते हुए हमें कभी यह महसूस न हो कि हम किसी से कम हैं।
क्योंकि भाषा सिर्फ शब्द नहीं होती।
उसके साथ हमारी यादें जुड़ी होती हैं।
हमारा परिवार जुड़ा होता है।
हमारी संस्कृति जुड़ी होती है।
और हमारी पहचान जुड़ी होती है।
तो आज एक काम जरूर कीजिए।
सिर्फ “हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ” लिखकर आगे मत बढ़ जाइए।
अपने बच्चे के साथ बैठिए और उससे पूछिए—
“बेटा, आज तुमने हिंदी का कौन-सा नया शब्द सीखा?”
अगर आप मेरी इस बात से सहमत हैं तो इस संदेश को जरूर साझा कीजिए।
शायद किसी एक घर में भी आज हिंदी में 20 मिनट की बातचीत शुरू हो जाए, तो इस हिंदी दिवस का मतलब थोड़ा और बड़ा हो जाएगा।
हिंदी दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।
मैं हूँ रेनू सिंह और आप देख रहे हैं Headline Bureau।
अपनी भाषा से जुड़े रहिए, दूसरी भाषाओं का सम्मान कीजिए और अपने बच्चों को उनकी जड़ों से जरूर जोड़े रखिए।
नमस्कार।

1 week ago | [YT] | 3